कार्तिक की कथा – Kartik ki katha

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कार्तिक की कथा Kartik ki kahani कार्तिक मास में व्रत के समय कही और सुनी जाती है। यह महीना धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें बहुत से बड़े व्रत और त्यौहार जैसे करवा चौथ , दिवाली , तुलसी विवाह आदि आते है।

इन सबकी विधि विस्तार पूर्वक इस लेख के अंत में दी गई हैं वहां क्लीक करके पढ़ सकते हैं। कार्तिक की कथा और महत्तम कहने और सुनने से व्रत का पूरा लाभ प्राप्त होता है।

कार्तिक की कथा – Kartik ki katha

एक बार सास ने बहु से कहा कि मैं कार्तिक स्नान करना चाहती हूँ। बहु बोली जरूर करो , मैं भी आपके साथ कार्तिक स्नान कर लेती हूँ। सास बोली -बहु तुम्हारी तो अभी बहुत उमर पड़ी है तुम बाद में कर लेना। यह कहकर सास गंगा स्नान के लिए चली गई।

पीछे बहु में कुम्हार के यहाँ से मिट्टी के छोटे कुण्डे मंगा कर रख लिए। बहु रोज सुबह जल्दी उठकर नहाने के लिए कुन्डा लेती और बोलती –

” मन चंगा तो कुण्डे में ही गंगा “

” सास नहाये ऊण्डे बैठ , मैं नहाऊं कुण्डे बैठ “

बहु के यह कहने पर कुण्डे में गंगाजी आ जाती और बहु नहा लेती।

एक दिन नहाते वक्त सास की सोने की नथ गंगा जी में बह गई। जब बहु ने नहाने के लिए कहा – मन चंगा तो कुण्डे में ही गंगा , तो गंगा जी के साथ ही नथ भी कुण्डे में आ गई। बहु ने सास की नथ को पहचान लिया।

कार्तिक मास पूरा हुआ तो सास घर आ गई। बहु ने वही नथ पहन कर सास का स्वागत किया। सास में कहा बहु यह तो मेरी नथ है गंगा जी में गिर गई थी तुम्हे कैसे मिली ? बहू ने सास को कुण्डों में गंगा जी आने और साथ में नथ आने की बात बताई।

सास ने बहू से कहा की मुझे ब्राह्मण भोजन करवाना है। बहु बोली मुझे भी करवाना है , मैंने भी कार्तिक स्नान किये हैं। व्रत उपवास भी किये हैं। पीपल , पथवारी , तुलसी को सींचा है। दीपक जलाया है। घर में ही भगवान की परिक्रमा लगाई है। मेरी परिक्रमा यहीं स्वीकार करने की प्रभु से प्रार्थना की है।

सास को विश्वास नहीं हुआ। बोली – तूने कार्तिक स्नान नहीं किये।

बहु सास को अंदर ले गई और कुण्डे दिखाए। वे कुण्डे सोने के हो गए थे। अब सास को विश्वास हो गया और ख़ुशी ख़ुशी दोनों ने व्रत का उद्यापन किया। ब्राह्मण भोजन करवाया। दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।

यह कथा कहने वाले , सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी का कल्याण हो। सभी को ऐसा ही फल मिले।

जय श्री राधे कृष्ण !!!

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