छठ पूजा सूर्य षष्ठी व्रत करने का फल – Dala Chhath Pooja Surya Shashthi Vrat

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छठ पूजा Dala chhath pooja या सूर्य षष्ठी व्रत surya shashthi vrat कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि यानि छठ को

किया जाता है। दीपावली से छः दिन बाद यह छठ आती है । कहा जाता है कि प्रभु श्रीराम और सीता माता ने 14 वर्ष के वनवास के बाद

अयोध्या लौटने पर कार्तिक शुक्ल पक्ष में व्रत रखते हुए राज्याभिषेक के समय सूर्य भगवान की पूजा की थी। तभी से कार्तिक में डाला छठ

पूजा और व्रत करने की परंपरा शुरू हुई । इसके अलावा भी कई प्रकार की मान्यताएं प्रचलित है।

 

छठ पूजा

 

यह बहुत पुराना त्यौहार है। इस दिन भगवान सूर्य और छठी मैया chhati mata ( सूर्य भगवान की पत्नी ऊषा ) की पूजा की जाती है। सूर्य

भगवान की दो पत्निया बताई गई है। ऊषा और प्रत्यूषा। छठ पर्व में दोनों की पूजा का विधान है। सूर्य भगवान की पूजा तथा छठ का व्रत

chhath ka vrat परिवार की सुख समृद्धि धन धान्य तथा पति पुत्र के सुखों की कामना से किया जाता है । माना जाता है कि सूर्य की इस पूजा

से कई प्रकार के रोग दूर होते है आँखों और त्वचा के लिए इसे विशेष तौर पर लाभदायक माना जाता है।

 

यह कठोर व्रत चार दिन तक चलता है। जो चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है। इसमें चार दिन की  चार अलग रस्में होती

है। जिसमे नहाय खाय ( स्नान और खाना ) , खरना ( खीर रोटी ) व्रत ,  तथा सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य को अर्घ्य और प्रसाद अर्पित

करना शामिल  होता है।

 

छठ पूजा की तारीख 2017

chhath Pooja Dates 2017

 

नहाय  खाय                      –  24 अक्टूबर 2017 , मंगलवार – चतुर्थी तिथि

 

लोहंडा – खरना                —  25  अक्टूबर 2017 , बुधवार – पंचमी तिथि

 

संध्या अर्घ्य / छठ पूजा     —  26  अक्टूबर 2017 , गुरुवार – षष्ठी तिथि

 

ऊषा अर्घ्य / पारना          —   27  अक्टूबर 2017 , शुक्रवार – सप्तमी तिथि

 

छठ पूजा चार दिन कैसे होती है

Four days dala chhath puja

 

नहाय खाय – Nahay Khay

 

पहला दिन नहाय खाय कहलाता है। यह चतुर्थी तिथि को होता है। इस दिन पवित्र नदी सरोवर में स्नान करते है। पवित्र पानी घर पर लाकर

खाना बनाते है। इस दिन एक ही बार खाना खाकर व्रत करते है। पवित्रता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

 

लोहंडा खरना – Lohanda Kharna

 

दूसरा दिन खरना कहलाता है। यह पंचमी तिथि को होता है। खरना पूजन के दिन से देवी षष्ठी का आगमन माना जाता है। इस दिन बिना पानी

पिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक व्रत करते है। यह अलूना व्रत होता है यानि नमक नहीं लिया जाता है। सूर्यास्त के समय सूर्य को अर्घ्य देते है। यह

छठ पूजा का पहला अर्घ्य भी कहलाता है। सूर्य को भोग अर्पित किया जाता है। भोग लगाने की सामग्री एक बांस के सूप में रखी जाती है।

भोग में गुड़ से बनी खीर व  रोटी  विशेष रूप से होती  है। इसके अलावा गेहूं का आटा , गुड़ और मेवे आदि मिलाकर स्वादिष्ट  ” ठेकुआ “

Thukua बनाया जाता है। इस खाने में नमक नहीं होता है । भोग लगाने के बाद व्रत खोलते है और प्रसाद पाते है ।

इस दिन लहसुन , प्याज आदि का उपयोग नहीं करते है। इसके तुरंत बाद से छठ का व्रत शुरू हो जाता है।

 

छठ पूजा ,संध्या अर्घ्य – Chhath Pooja , Sandhya Arghya

 

तीसरे दिन यानि छठ वाले पूरे दिन बिना कुछ खाये और बिना कुछ पिए व्रत किया जाता है। पानी भी नहीं पिया जाता । इस दिन सूर्यास्त के

समय सूर्य को विशेष अर्घ्य  दिया जाता है तथा सूर्य की पूजा की जाती है। यह किसी नदी या तालाब में कमर तक के पानी में खड़े होकर सूर्य

की पूजा की जाती है। यह छठ की मुख्य रस्म होती है। व्रत करने वाले के साथ परिवार और मित्रगण भी होते है। छठ मैया के गीत chhath

mata ke geet गाये जाते है। अगले दिन सूर्योदय के बाद पारना किया जाता है यानि व्रत खोला जाता है।

 

ऊषा अर्घ्य , पारना – Usha Arghya , Parna

 

चौथे दिन सभी लोग नदी के किनारे जाते है सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देते है जिसे ऊषा अर्घ्य कहते है। यह छठ पूजा का दूसरा अर्घ्य भी

कहलाता है । अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है। इस प्रकार छठ के  36 घंटे का व्रत का समापन होता है।

माना जाता है की इस व्रत को करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति अवश्य होती है। जब किसी परिवार में छठ पूजा की शुरुआत कर दी जाती है तो

यह हर साल करनी जरुरी होती है। इसे अगली पीढ़ी को भी निभाना होता है। यदि परिवार में किसी का देहावसान हुआ हो तो सिर्फ उस वर्ष

की छठ पूजा टाली जा सकती है।

 

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