दशा माता साँपदा का डोरा व्रत – Dasha mata sanpda dora vrat

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दशा माता का व्रत Dasha mata ka vrat  दशा या परिस्थिति अनुकूल बनी रहे ऐसी कामना के साथ किया जाता है। दशा माता यानि माँ भगवती की पूजा करके महिलायें इस व्रत करके डोरा गले में पहनती है ताकि परिवार में शांति और सुख समृद्धि बनी रहे। इसे साँपदा माता का डोरा भी कहते हैं।

ऐसा माना जाता है की जब किसी की दशा सही चल रही हो तो उसके सारे काम आसानी से सम्पूर्ण हो जाते हैं और दशा ख़राब हो तो पूरी कोशिश करने पर भी कोई काम पूरा नहीं होता।

दशा ख़राब हो तो अनेक प्रकार की बाधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस स्थिति से बचने के लिए और दशा सही बनी रहे इसी कामना के साथ यह माँ भगवती दशा माता का व्रत महिलाओं द्वारा भक्तिभाव से किया जाता है।

दशा माता सांपदा माता व्रत व डोरा

दशा माता का व्रत कब करते हैं

Dasha mata ka vrat kab hota he

दशा माता का व्रत चैत्र महीने में कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के दिन किया जाता है। होली के दस दिन बाद यह व्रत आता है। होली पूजन वाली सामग्री जैसे हल्दी की गाँठ और सूत की कूकड़ी आदि इस पूजा में काम ली जाती है। माना जाता है की होली की अग्नि के ताप से ये चीजें दिव्य हो जाती हैं।

दशा माता का डोरा Dashamata ka dora या साँपदा का डोरा  Sampada ka dora दशमी के दिन पूजन के बाद गले में पहना जाता है। एक समय भोजन करके पूरे दिन व्रत करते हैं। भोजन में नमक नहीं लेते हैं। दशा माता की पूजा पीपल के पेड़ की छाँव में करना शुभ माना जाता है।

दशा माता का डोरा कैसे बनाते हैं

Dasha mata ka dora kaise banaye

होली के पूजन वाले कच्चे सूत के दस तार से लच्छी या गंडा बनाते हैं । इस लच्छी को हल्दी घिस कर उसमे रंग लिया जाता है। इसमें दस गाँठ लगाई जाती है। इस प्रकार तैयार डोरे को पूजन करके गले में पहना जाता है।

दशा माता का पूजन करने की विधि

Dashamata poojan Vidhi

दशा माता की मूर्ती या चित्र की पूजा की जाती है।

मूर्ति या चित्र नहीं हो तो नागरबेल के पान के पत्ते ( पूजा में काम आने वाला डंडी और नोक वाला पत्ता ) पर चन्दन से दशा माता बनाकर पूजा की जा सकती है।

यह पूजा पीपल के पेड़ के पास या घर पर कर सकते हैं।

सुबह स्नान आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प लेते हैं । दशा माता के पास कुंकुम , काजल और मेहंदी की दस दस बिंदी लगाते हैं। दस दस गेहूँ की दस ढ़ेरी पास में सजाई जाती है। लडडू , हलवे , लापसी या  मीठे रोठ आदि का भोग दस ढेरियों के पास रखा जाता है। दस गाँठों का डोरा पूजा में रखा जाता है।

दशा माता और दस गाँठ वाले डोरे या गंडे का पूजन अक्षत , पुष्प आदि से करते हैं। धूप दीप जलाते हैं। पिछले साल का डोरा भी पास में रखते हैं। इसके बाद दशा माता की कहानी कहते और सुनते हैं। कहानी पीपल के पेड़ की पूजा के बाद भी कही सुनी जा सकती है।

पूजा करने या कथा सुनने के बाद दशा माता का नया डोरा गले में पहन लिया जाता है।

इसके बाद  गेहूं , भोग और पुराना डोरा लेकर पीपल के पेड़ के पास जाते हैं। गेहूं और पिछले साल का डोरा पीपल की जड़ के पास मिट्टी में दबा दिया जाता है।  पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती है।

पीपल के पेड़ पर कुंकुम , काजल और मेहंदी से दस दस बिंदी लगाते हैं। भोग के रूप में नैवेद्य लापसी , चावल आदि चढ़ाया जाता है और सूत का धागा बांधकर सुख सौभाग्य व मंगल की कामना करते हुए परिक्रमा की जाती है। पीपल को चुनरी ओढ़ाई जाती है।

पूजा के बाद नल दमयंती वाली दशा माता की कथा कही और सुनी जाती है।

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कुछ लोग दस कहानियाँ सुनते हैं।

इसके पश्चात दशा माता की आरती गाई जाती है।

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पीपल की थोड़ी सी छाल खुरच कर गेहूं के दानों के साथ घर लाते हैं। इसे साफ कपड़े में लपेट कर तिजोरी या अलमारी में रखते हैं। पीपल की छाल को धन का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है की पीपल की छाल इस प्रकार घर में रखने से सुख समृद्धि बनी रहती है।

कहीं कहीं दशा माता के पूजन के बाद पथवारी पूजन भी किया जाता है। नव विवाहित महिलायें शादी का जोड़ा पहनती है और पूरा श्रृंगार करके यह पूजा करती हैं।

व्रत के सकल्प की पूर्ति के रूप में दस पूरियां , दस सिक्के और दस चम्मच हलवा ब्राह्मणी या घर की बुजुर्ग महिला के पैर छूकर उन्हें दिया जाता है।

दशा माता का डोरा कब खोलते हैं

Dasha mata ka dora kab khole

वैसे तो दशा माता का डोरा साल भर गले में पहना जाता है। लेकिन यदि साल भर नहीं पहनना हो तो दशा माता का डोरा वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष में किसी अच्छे दिन खोलकर रखा जा सकता है। उस दिन व्रत करना चाहिए और सांपदा माता की कहानी सुननी चाहिए।

इतना भी नहीं पहनना चाहें तो जिस दिन पहनते हैं उसी दिन डोरे को रात के समय उतार कर पूजा के स्थान पर रख दें और अगले वर्ष पूजा के बाद पीपल की जड़ में दबा दें।

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