मंगला गौरी व्रत और पूजा की सम्पूर्ण विधि – Mangla Gauri Vrat Pooja

मंगला गौरी व्रत  Mangla Gauri Vrat सावन महीने के मंगलवार को किया जाता है। इस व्रत की शुरुआत सावन महीने के शुक्ल पक्ष के

पहले मंगलवार से की जाती है। इसके बाद चार या पांच साल तक लगातार सावन महीने के प्रत्येक मंगलवार को व्रत किया जाता है। सावन

महीने में ही व्रत का उद्यापन भी किया जाता है।

मंगला गौरी व्रत और पूजा

 

16 मंगलवार के बाद 17 वें  मंगलवार को या 20 मंगलवार के बाद 21 वें मंगलवार को उद्यापन किया जा सकता है। उद्यापन सावन महीने के

शुक्ल पक्ष में किया जाता है। यह व्रत पति की लम्बी आयु के लिए किया जाता है।

 

मंगला गौरी व्रत का उद्यापन करने की विधि जानने के लिए यहाँ क्लीक करें

 

मंगला गौरी व्रत और पूजा विधि  – Mangla Gauri pooja Vidhi

 


नित्य कर्मों से निवृत होकर स्वच्छ और सुन्दर वस्त्र पहनें। एक साफ पाटे पर लाल और सफ़ेद कपड़ा इस प्रकार लगायें की आधे पाटे पर सफ़ेद

और आधे पर लाल कपड़ा हो। अब सफेद कपड़े पर  चावल से नौ छोटी ढ़ेरी बना दें। ये नवग्रह होते हैं।  लाल कपड़े पर गेहूं से सोलह ढ़ेरी बना

दें। ये सोडष मातृका होते हैं। एक जगह थोड़े चावल रखकर वहां गणेश जी को बिठायें।

 

पाटे पर एक अन्य जगह गेहूं की एक ढ़ेरी बना कर उस पर जल कलश रखें। जल कलश में आम की या अशोक की पांच पत्तियां एक सुपारी ,

व दक्षिणा के लिए सिक्का डालें। कलश पर ढक्कन लगाकर इस पर थोड़े चावल रखें। थोड़ी से दूब लाल कपड़े में बांध कर इस पर रखें।

आटे से बना चार मुख वाला दीपक बत्ती और घी लगाकर जलायें और सोलह अगरबत्ती जलायें। पूजा का संकल्प लें।

 

सबसे पहले गणेश जी का पूजन षोडशोपचार विधि से करें। पंचामृत , जनेऊ , चन्दन , रोली , मोली , सिन्दूर, सुपारी , लौंग , पान , चावल , पुष्प

, इलायची , मिष्ठान ,बिलपत्र , फल , नैवेद्य , दक्षिणा आदि अर्पित करें। आरती करें।

 


अब कलश की पूजा करें। कलश पर सिन्दूर और बीलपत्र ना चढ़ायें।

 

नवग्रह और षोडश मातृका का पूजन करें। षोडश मातृका के पूजन में जनेऊ ना चढ़ायें , हल्दी , मेहंदी , सिन्दूर चढ़ायें।

 

अब माँ मंगला गौरी के पूजन की तैयारी करें। एक थाली में चकला रखें। चकले के पास आटे से बना हुआ सील बट्टा रखें। चकले पर मिट्टी से

मंगला गौरी बनाकर रखें।

 

माँ मंगला गौरी को जल , दूध , दही , घी , शहद , चीनी , पंचामृत से स्नान करायें। माता को वस्त्र और आभूषण पहनायें। रोली , अक्षत ,चन्दन ,

सिन्दूर , हल्दी , मेहंदी , काजल अर्पित करें। सोलह पुष्प अर्पित करें। अब माला , आटे के लड़डू , फल , मेवा , धान , जीरा , धनिया , पान ,

सुपारी , लौंग , इलायची , चूड़ियाँ आदि सभी चीजें सोलह सोलह चढ़ायें। एक सुहाग पिटारी चढ़ायें जिसमे ब्लाउज , रोली , मेहंदी , काजल ,

सिन्दूर ,कंघा , शीशा तथा दक्षिणा रखें।

इसके बाद मंगला गौरी व्रत की कथा सुनें। यह कथा जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

 

इसके बाद सोलह तार की बत्ती वाला दीपक और कपूर जला कर आरती करें। परिक्रमा लगायें।

 

सोलह आटे के लड़डू का बायना सासु माँ को देकर पैर छुएँ और आशीर्वाद लें। फिर खाना खा लें। इस व्रत में एक ही अनाज का भोजन किया

जाता है तथा नमक नहीं खाते हैं। व्रत के दूसरे दिन नदी या तालाब में गौरी का विसर्जन करके भोजन करें।

 

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