अक्षय तृतीया की पूजा महत्त्व और कहानी – Akshay Tritiya

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अक्षय तृतीया Akshay Tritiya वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाई जाती है। इस दिन देवी लक्ष्मी और विष्णु भगवान की पूजा की जाती है। इसे आखा तीज Akha teej और अक्ति Akti के नाम से भी जाना जाता है।

अक्षय तृतीया एक महत्वपूर्ण दिन है। हिन्दू कैलेंडर में किसी महीने में कोई तिथि घट भी सकती है और बढ़ भी सकती है। जैसे किसी महीने में ग्यारस तिथि दो बार आ सकती है या किसी महीने में दशमी तिथि के बाद अगले दिन बारस तिथि हो सकती है।

लेकिन अक्षय तृतीया एक ऐसी तिथि है जो कभी भी ना तो कम होती है ना ही बढ़ती है। इसीलिए इसका नाम अक्षय तृतीया है। अक्षय का मतलब है जिसका कभी भी क्षय नहीं होता।

अक्षय तृतीया

हिंदी और जैन धर्म में अक्षय तृतीया के कई महत्त्व हैं। जो इस प्रकार हैं :

अक्षय तृतीया का महत्त्व

Importance of Akshay Tritiya

—  भगवान परशुराम ने विष्णु के छठे अवतार के रूप में इसी दिन जन्म लिया था। यह दिन परशुराम जयंती के रूप में मनाया जाता है।

—  वेद व्यास जी ने गणेशजी के साथ महाभारत लिखने की शुरुआत इसी दिन की थी।

—  इसी दिन भगवान कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को महल और धन धान्य से परिपूर्ण करके दोस्ती का फर्ज निभाया था।

—  इस दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और त्रेता युग की शुरुआत हुई थी।

—  माना जाता है कि इस दिन किया गया जप तप , पितृ तर्पण , दान पुण्य आदि करने से का इसका फल हमेशा व्यक्ति के साथ रहता है , जिसका कभी क्षय नहीं होता।

—   किसी भी शुभ कार्य जैसे शादी , गृह प्रवेश , मकान बनाना , नये व्यापार की शुरुआत आदि के लिए अक्षय तृतीया का दिन अबूझ मुहूर्त वाला दिन कहलाता है अर्थात बिना किसी संकोच के किसी भी कार्य की शुरुआत इस दिन की जा सकती है।

—  अक्षय तृतीया को भाग्य तथा सफलता देने वाला दिन माना जाता है। बहुत से लोग इस दिन सोना खरीदना शुभ मानते है।

—  जैन धर्म में इसे तीर्थंकर ऋषभनाथ द्वारा एक वर्ष के उपवास के बाद गन्ने का रस पीकर उपवास समाप्त करने के दिन के रूप में मनाया जाता है। जैन धर्म का पालन करने वाले लोग इस दिन सिर्फ गन्ने के रस पीकर व्रत करते है। गन्ने का रस फायदे नुकसान जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

— इस दिन गंगा नदी स्वर्ग से उतर कर धरती पर आई थी। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्त्व माना जाता है।

—  प्रसिद्ध साढ़े तीन मुहूर्त Sade Teen Muhurat में अक्षय तृतीया का दिन भी शामिल है। इसके अलावा चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा , विजयादशमी , कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा वाले दिन भी साढ़े तीन मुहूर्त में गिने जाते है।

—  ज्योतिष के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सूर्य और चन्द्रमा अपनी सम्पूर्ण उच्च क्षमता के साथ बराबर चमक बिखेरते हैं ।

— उड़ीसा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा के लिए रथ बनाने की शुआत इसी दिन की जाती है।

—  वृन्दावन में केवल अक्षय तृतीया के दिन ही बाँके बिहारी जी के चरण कमल के दर्शन होते हैं।

—  चार धाम की यात्रा के भगवान बद्रीनाथ के दर्शन अक्षय तृतीया के दिन से खोले जाते है।

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अक्षय तृतीया का दिन त्यौहार की तरह मनाया जाता है। घरों में इस दिन विशेष व्यंजन बनाये जाते है।

अक्षय तृतीया पर बनने वाले व्यंजन इस प्रकार के होते है। जैसे  – गेंहू का खीचड़ा और मंगोड़ी की सब्जी , गुलाब ( गलवानी )  , बाजरे की खिचड़ी , मूँग चावल की खिचड़ी बिना नमक वाली इत्यादि । इस दिन पक्की रसोई भी नही बनाई जाती तथा पापड़ नहीं सेका जाता है।

पक्की रसोई का मतलब कढ़ाई में तलकर बनाये जाने वाला भोजन जैसे पूरी । इस दिन नया घड़ा, पंखी, चावल, घी , दाल , नमक ,  इमली तथा दक्षिणा आदि दान करने का विशेष महत्त्व माना जाता है।

अक्षय तृतीया की पूजा विधि

Akshay Tritiya Pooja Vidhi

आखा तीज के दिन देवी लक्ष्मी व नारायण की पूजा की जाती हैं। पूजा की विधि इस प्रकार है –

—  सुबह नहाकर स्वच्छ कपड़े पहनें।

—  सबसे पहले भगवान नारायण ( विष्णु जी ) व लक्ष्मी जी की प्रतिमा को जल से स्नान कराएं।

—  स्नान कराने के बाद प्रतिमा को सूखे व स्वच्छ कपड़े से पोंछकर यथास्थान स्थापित करें।

—  रोली व चन्दन का टीका लगाकर अक्षत अर्पित करें।

—  मौली अर्पित करें।

—  माला , पुष्प आदि अर्पित करें।

—  दक्षिणा अर्पित करें।

—  भगवान को तुलसी-दल और नैवेद्य के रूप में  मिश्री व भीगे हुए चनों का भोग अर्पित करें। खीचड़ा बनाया हो तो तुलसी का पत्ता डालकर उसे भगवान को अर्पित करें।

—  पान , लौंग , इलायची अर्पित करें।

—  पूजन के बाद कहानी सुननी चाहिए। अक्षय तृतीया की कहानी आगे बताई गई है वहाँ से देख सकते हैं।

—  धूप , दीप से आरती करें।

—  यथा संभव ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें दान दक्षिणा दें।

अक्षय तृतीया की कहानी – Akshay Tritiya Story

बहुत समय पहले की बात है कुशावती नामक नगरी में महोदय नाम का एक वैश्य रहता था। सौभाग्यवश महोदय वैश्य को एक पंडित से अक्षय तृतीया के व्रत करने की विधि के बारे में पता चला।

महोदय ने भक्ति – भाव से विधि पूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रताप से महोदय वैश्य कुशावती का महाप्रतापी शक्तिशाली राजा बन गया। उसका खजाना हमेशा स्वर्ण मुद्राओं , हीरे जवाहरातों से भरा रहता था। राजा महोदय अच्छे स्वभाव का तथा दानवीर था। वह उदार मन से खुले हाथ से दान करता था और असहाय व गरीबो की भरपूर सहायता  करता था।

एक बार राजा का वैभव और सुख शांतिपूर्ण जीवन देख कर दूसरे राजाओं ने उसकी समृद्धि का कारण पूछा। राजा ने स्पष्ट रूप से अपने अक्षय तृतीया व्रत की कथा कह सुनाई और कहा कि सब कुछ अक्षय तृतीय व्रत की कृपा से हुआ है।

राजा से सुनकर उन्होंने अपने राज्य में जाकर विधि विधान सहित अक्षय तृतीया का पूजन व व्रत किया तथा प्रजा को भी ऐसा ही करने को कहा। अक्षय तृतीया के पुण्य प्रताप से उनके सभी नगर वासी , धन धान्य से पूर्ण होकर वैभवशाली और सुखी हो गए।

हे अक्षय तीज माता ! जैसे आपने उस वैश्य को वैभव और राज्य दिया वैसे ही अपने सब भक्तो को धन धान्य और सुख देना। सब पर अपनी कृपा बनाये रखना।

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