महाशिवरात्री व्रत कथा – Maha Shiv Ratri Vrat Kahani

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महाशिवरात्रि व्रत कथा या कहानी व्रत में कही और सुनी जाती है। महाशिवरात्रि फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती है। यह

भोलेनाथ प्रभु शिव शंकर की आराधना का सबसे उचित समय होता है। भोलेनाथ वैसे भी तुरंत प्रसन्न हो जाते है। यह दिन तो विशेष है। इस

दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था।

भक्ति भाव के साथ इस दिन व्रत करने और महाशिवरात्रि के व्रत की कथा  Maha Shiv ratri Vrat ki kahani सुनने से महादेव का

आशीर्वाद प्राप्त होता है। महाशिवरात्रि के पूजन और व्रत का तरीका जानने लिए यहाँ क्लीक करें

महाशिवरात्रि व्रत कथा

माना जाता है की किसी भी व्रत को करने पर उसकी कहानी सुनने से व्रत का पूरा लाभ मिलता है। साथ में गणेश जी की या विनायक

जी की कहानी भी सुनी जाती है। हर व्रत की एक अलग कथा और कहानी होती है।

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महाशिवरात्रि व्रत कथा कहानी – Maha shiv ratri Story

 

एक शिकारी था। वह शिकार करके अपने परिवार के साथ जीवनयापन करता था।

एक बार जंगल में नदी किनारे शिकार करने के लिए बील के पेड़ पर मचान बनाने लगा। उस बील वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो पत्तों से ढक

गया था और दिखाई नहीं दे रहा था ( बील के पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाये जाते है )

रात होने वाली थी। उसे अभी तक शिकार नहीं  मिला था। वह नदी से पीने का पानी लेकर पेड़ पर चढ़ गया और शिकार का इंतजार करने

लगा।

 

एक हिरनी पानी पीने आई। शिकारी ने तुरंत धनुष से निशाना साधा। इस हलचल में थोड़ा पानी शिवलिंग पर गिरा और कुछ बील के पत्ते भी

गिरे। अनजाने ने ही शिवजी की पहले प्रहर की पूजा हो गई। हिरनी ने आवाज सुनकर देखा तो शिकारी दिखाई दिया। हिरनी ने डरते हुए

कहा ” मुझे मत मारो ”  शिकारी बोला कि उसका परिवार भूखा  है। हिरनी ने कहा मेरे बच्चे साथ में हैं। मैं इन्हें अपने स्वामी के पास छोड़कर

वापस आती हूँ। शिकारी को विश्वास नहीं हुआ। हिरनी बोली कि जिस प्रकार यह सच है कि धरती सत्य पर टिकी हुई है , समुद्र मर्यादा में

रहता है तथा झरने से जल धारा नीचे ही गिरती है उतना ही सच वह बोल रही है। वह जरूर वापस आएगी | यह सुनकर शिकारी से उसे

जल्दी वापस आने को कहकर जाने दिया। ( महाशिवरात्रि व्रत कथा……)

 

थोड़ी देर बाद एक दूसरी हिरनी पानी पीने आई। शिकारी ने निशाना साधा तो फिर थोड़ा पानी और पत्ते शिवलिंग पर गिरे।

और अनजाने में दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गई। हिरनी ने शिकारी को देखा तो उसने जीवन दान देने की प्रार्थना की और कहा की वह

गर्भावस्था में है अतः उसे जाने दे। बच्चा उसके स्वामी को देने के बाद वापस आने का वचन देने लगी। विश्वास ना करने पर वह बोली  उसे

पता है कि वचन देकर पलट जाने से सारे पुण्य नष्ट हो जाते है। इसलिए वह जरूर लौटेगी। भरोसा करके शिकारी ने उसे भी जाने दिया।

 

कुछ देर बाद एक हिरन वहाँ आया। शिकारी ने फिर बाण चढ़ाया तो कुछ और पानी और पत्ते गिरने से तीसरे प्रहर की पूजा हो गई। हिरन ने

परिवार से अंतिम बार मिलकर वापस आने की याचना की। शिकारी बोला पहले वाले भी वापस नहीं आये। तुम भी नहीं आओगे तो मेरे परिवार

का क्या होगा। हिरन बोला अगर वह वापस न आये तो उसे वह पाप लगे जैसा उसको लगता है जो समर्थ होते हुए भी दूसरों की मदद नहीं

करता। इस पर विश्वास करके शिकारी ने हिरन को भी जाने दिया। ( mahashiv ratri vrat ki kahani …..)

 

रात के अंतिम प्रहर में उसने देखा की सभी हिरन हिरनी बच्चे आदि आ रहे थे। उसने खुश होकर धनुष उठाया तो जल और पत्ते फिर

शिवलिंग पर गिरे तो चौथे प्रहर की पूजा हो गई। इस प्रकार चारों प्रहर की पूजा संपन्न हुई तो शिकारी के सारे पाप भस्म हो गए।

उसकी अंतरात्मा जाग गई और उसका निर्दयी मन कोमल हो गया।

 

भगवान शंकर के प्रभाव से उसका ह्रदय परिवर्तन हो गया और वह अहिंसावादी बन गया। वह सोचने लगा की ये पशु होकर भी परोपकार

करना चाहते है और मैं मनुष्य होते हुए भी कुकृत्य कर रहा हूँ। उसे बहुत ग्लानि हुई और उसने सभी हिरणों को जाने दिया। शिकारी की

आँखों से अश्रु धारा निकलने लगी जो शिवलिंग पर गिर रही थी। शिव जी बहुत प्रसन्न हुए। ( maha shiv ratri vrat katha ….)

 

इस परोपकार और पूजा से भगवान शिव ने अति प्रसन्न होकर  शिकारी को अपने दिव्य स्वरुप के दर्शन दिए और सुख समृध्दि का वरदान

दिया। शिकारी और उसके परिवार को सुख समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति हुई।

 

इस प्रकार अनजाने में की गई पूजा से भी प्रसन्न होने वाले भोलेनाथ भगवान शिव शंकर हमेशा हम सभी के विचार और कर्म परोपकारी

और उदार बनाये रखें और सभी की मनोकामनाएँ पूरी करें।

 

जय शिव शंकर   !!!

जय भोलेनाथ    !!!

 

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