अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी – Anant chaudas ki katha

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अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी अनंत चौदस व्रत की पूजा के समय कही और सुनी जाती है . यह व्रत भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि ( भादवा सुदी चौदस ) के दिन किया जाता है. व्रत की कहानी सुनने से व्रत का सम्पूर्ण लाभ मिलता है . यहाँ अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी Anant chaudas vrat ki kahani बताई गई है इसे पढ़ें और लाभ उठायें .

अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी – Anant Chaturdashi vrat story

सुमंत नाम का एक ब्राह्मण था . एक सुन्दर कन्या के जन्म के बाद उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी . ब्राह्मण ने दूसरा विवाह कर लिया था . सौतेली माँ का व्यवहार बेटी के साथ अच्छा नहीं था.

ब्राह्मण ने बेटी सुशीला के बड़े होने पर उसका विवाह कौन्डिल्य नाम के ऋषि के साथ कर दिया . विदाई के समय सौतेली माँ ने बेटी को विदा करते समय एक टोकरी दी जिसमे सुन्दर वस्त्र , फल , मिठाई के स्थान पर मिट्टी के ढेले और फटे पुराने वस्त्र आदि रख दिए  .

ऋषि कौन्डिल्य अपनी पत्नी सुशीला को लेकर आ रहे थे . रास्ते में वे विश्राम करने के लिए एक तालाब के पास रुके . सोचा थोड़ा जलपान आदि कर लें . ऋषि नहाने धोने तालाब के पास चले गए . सुशीला ने टोकरी खोली तो उसमे पकवान की जगह मिट्टी के ढेले देख कर उसका मन घबरा उठा . (अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी ….)

तभी उसकी नजर सजी धजी कुछ महिलाओं पर पड़ी . मदद के लिए सुशीला उनके पास गई . उसने देखा वे महिलाएं पूजा की तैयारी कर रही थी . पूछने पर उन्होंने अनंत भगवान की पूजा और अनंत सूत्र के बारे में बताया .

सुशीला ने भी पूजा में हिस्सा लिया और सच्चे मन से हाथ पर अनंत सूत्र बांध लिया . मन ही मन प्रार्थना करने लगी – हे अनंत देव , मेरे पिता की लाज रखना , टोकरी में मिट्टी , फटे पुराने कपड़े लेकर ससुराल कैसे जाऊंगी . मेरा कष्ट दूर करो भगवन .

ससुराल पहुँचने पर जब टोकरी खोली गई उसमे सुन्दर वस्त्र , फल , मिठाई आदि भरे हुए थे . अनंत देव की कृपा से ससुराल में बहुत मान मिला और घर भी धन धान्य से परिपूर्ण रहा . (अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी ….)

एक दिन ऋषि कौण्डिन्य की नजर उसकी बाहँ पर बंधे अनंत सूत्र पर पड़ी . उन्हें लगा की उनकी पत्नी ने कुछ जादू टोना करने के लिए डोरा बांधा है . उन्होंने क्रोधित होकर धागा तोड़कर आग में फेंक दिया . इससे अनंत भगवान का अपमान हुआ .

इस घटना के बाद से ही घर में दुःख और दरिद्रता बढ़ने लग गए . ऋषि कौन्डिल्य कोढ़ बीमारी से ग्रस्त हो गए . उन्होंने सुशीला से कहा कि समझ नहीं आ रहा , अचानक ये विपदा क्यों आ रही हैं . सुशीला ने अनंत भगवान के डोरे के बारे में बताया और कहा कि अनंत भगवान का अपमान हुआ है .

ऋषि ने कहा मैं अनंत भगवान से अपने किये के लिए क्षमा प्रार्थना करूँगा . ऋषि घर से निकल कर जगह जगह घूम अनंत भगवान के बारे में पूछते रहे  . उन्होंने निश्चय किया कि जब तक अंनत भगवान से क्षमा नहीं मांग लूँगा घर नहीं जाऊँगा . (अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी ….)

चलते चलते बेहोश हो कर गिर पड़े . ऋषि के निश्चय को जानकर भगवान अनंत ने उन्हें दर्शन दिए और बोले – हे कौन्डिल्य , तुम्हारे पश्चाताप के कारण मै प्रसन्न हूँ . आश्रम जाकर चौदह वर्ष तक विधि विधान से अनंत व्रत करो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे . कौन्डिल्य ने वैसा ही किया .

इसके पश्चात उनकी तबियत में सुधार होता गया और वे पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गए तथा दरिद्रता भी समाप्त हो गई .

बोलो अनंत भगवान की …. जय !!!

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