कुम्भ मेला 2021 हरिद्वार कब क्यों और कैसे – Kumbh Mela Haridwar

865

कुम्भ मेला Kumbh ka mela 2021 में 14 जनवरी से 27 अप्रैल तक हरिद्वार में आयोजित है। यह अर्धकुम्भ है।  अर्धकुम्भ Ardhkumbh 6 साल में हरिद्वार या इलाहाबाद में होता है। देश विदेश से लोग आकर इस विश्व प्रसिद्ध मेले का हिस्सा बनते हैं।

हरिद्वार वह स्थान है जहाँ गंगा नदी अपने निर्गम “” गंगोत्री “” से निकलकर 253 किलोमीटर की यात्रा के बाद मैदानी क्षेत्र मे प्रवेश करती है । हरिद्वार को ‘गंगाद्वार’ के नाम से भी जाना जाता है ।

हरिद्वार मे समुद्र मंथन के बाद निकले अमृत के घड़े से कुछ बूंद गिर गई थी । एक मान्यता के अनुसार जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी वह स्थान हर की पौड़ी ब्रह्म कुण्ड है । ‘हर की पौड़ी’ हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है । भक्त तथा तीर्थयात्री पवित्र दिनों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है ।

हरिद्वार कुम्भ मेला 2021 की तारीख Dates इस प्रकार हैं –

कुम्भ मेला 2021 की तारीख

Kumbh mela 2021 Dates

14  जनवरी गुरूवार : मकर संक्रांति

11 फरवरी गुरूवार  : मौनी अमावस्या

16  फरवरी , मंगलवार : बसंत पंचमी

27 शनिवार : माघी पूर्णिमा

11  मार्च , गुरूवार : महाशिवरात्रि ( प्रथम शाही स्नान )

12 अप्रैल सोमवार : चैत्र सोमवती अमावस्या  ( दूसरा शाही स्नान )

13 अप्रैल मंगलवार : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा , हिंदी नववर्ष प्रारम्भ

14 अप्रैल बुधवार : मेष संक्राति , वैशाखी ( तीसरा शाही स्नान , कुम्भ स्नान )

21 अप्रैल बुधवार : राम नवमी

27 अप्रैल मंगलवार : चैत्र पूर्णिमा  ( चौथा शाही स्नान )

कुम्भ मेले का विशेष आकर्षण शाही स्नान Shahi snan होते हैं जो साधू संतों का स्नान है । ये साधू इस अवसर पर जंगल , पहाड़ों या गुफाओं से निकलकर स्नान के लिए आते हैं ।  विभिन्न अखाड़े अपनी बारी के हिसाब संगम स्नान का लाभ उठाते हैं ।

सबसे पहले नागा साधू Naga Sadhu शाही स्नान करते हैं । इन जटाधारी राख से लिपटे नागा साधुओं का स्नान एक अलग रोमांच पैदा करता है ।

कुम्भ के मेला सिर्फ धार्मिक कारण से नहीं है । कुछ विद्वानों के अनुसार इन स्थानों पर उस समय एक विशेष ऊर्जा तंत्र सक्रीय रहता है जो शरीर को आश्चर्यजनक रूप से लाभान्वित कर सकता है । उस समय वहां उपस्थित रहकर या नदी में स्नान करके उसका लाभ उठाया जा सकता है ।

कुम्भ का मेला कहाँ और क्यों होता है

यह तीन साल के अंतर से एक तीर्थ स्थल पर पवित्र नदी के तट पर होता है जो इस प्रकार हैं –

इलाहबाद   : गंगा , यमुना , सरस्वती के त्रिवेणी संगम स्थल पर

हरिद्वार      : गंगा नदी के तट पर

उज्जैन       : शिप्रा नदी के तट पर

नासिक      : गोदावरी नदी के तट पर

किसी एक तीर्थ स्थल पर बारह वर्ष बाद कुम्भ का मेला आयोजित होता है ।

प्रयाग और हरिद्वार में छः साल के अन्तराल से अर्धकुम्भ मेला आयोजित होता है ।

कुम्भ का मेला इन्ही चार जगहों पर क्यों आयोजित होता है इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो इस प्रकार है –

कुम्भ मेले की कथा – Kumbh mela story

एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप से देवता बहुत कमजोर हो गए थे । दैत्यों से बचने का उपाय पूछने वे भगवान विष्णु के पास गए । विष्णु जी ने उन्हें क्षीर सागर के मंथन से अमृत निकाल कर पीने की सलाह दी । यह काम दैत्यों के बिना संभव नहीं था । अतः उन्हें साथ लेकर समुद्र मंथन शुरू हुआ ।

जैसे ही अमृत कलश निकला इंद्र का पुत्र जयंत उसे लेकर आकाश में उड़ गया । दैत्यों ने पीछा करके उसे पकड़ लिया और अमृत कलश छीनने लगे । देवता और दानवों में युद्ध हुआ जो लगातार बारह दिन तक चला जो मनुष्य के बारह वर्ष के बराबर होते हैं ।

इस युद्ध के दौरान छीना छपटी में अमृत छलक कर पृथ्वी पर चार स्थानों कर गिरा । ये चार स्थान थे प्रयाग , हरिद्वार , नासिक और उज्जैन । अतः इन्ही जगहों पर बारी बारी से कुम्भ का मेला भरता है ।

माना जाता है कि अमृत की खींचतान के समय चन्द्रमा ने उसे व्यर्थ बह जाने से रोका , गुरु ने अमृतकलश को राक्षसों से छुपाया , सूर्य ने अमृतकलश फूटने से बचाया और शनि ने इंद्र के कोप से रक्षा की । अतः जब सूर्य , चन्द्र , गुरु और शनि ग्रहों का संयोग एक राशी में होता है तभी कुम्भ के मेले का आयोजन किया जाता है ।

उज्जैन के कुम्भ को सिंहस्थ कहा जाता है ।

बृहस्पति के सिंह राशी में तथा सूर्य के मेष राशी में प्रवेश करने पर कुम्भ का आयोजन नासिक में गोदावरी नदी के तट पर किया जाता है । यह स्थिति 12 वर्ष में एक बार बनती है । इसे महाकुम्भ Mahakumbh भी कहते हैं ।

इन्हे भी जानें और लाभ उठायें :

पीपल के पेड़ की पूजा विधि और महत्त्व 

नीम के फायदे , उपयोग और गुण 

बबूल के पेड़ से पाएं सस्ता और कारगर उपचार 

खाटू श्याम बाबा की पौराणिक कथा 

भैंस का दूध फायदेमंद या नुकसानदायक 

झाड़ू कैसे रखें धन वृद्धि के लिए 

कद्दु काशीफल क्यों जरूर खाना चाहिए 

वास्तु के अनुसार दिशा का असर 

बैगन कब और किसे नहीं खाना चाहिए 

फलाहारी कढ़ी कैसे बनायें व्रत के लिए 

बालों में मेहंदी लगाने के फायदे नुकसान