चश्मा कब कौनसा पहने और लेंस कैसा लगवायें – Specs and lenses

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चश्मा Specs शौकिया तौर पर भी लगाया जाता है और साफ दिखाई देने के लिए भी। फैशन और स्टाइल के लिए चश्मा chashma लगाने का चलन बहुत पुराना है। चश्मा कब और कैसा लगायें आइये जानें।

तेज धूप , पानी , धूल , मिट्टी आदि से बचाने के लिए भी चश्मा बहुत उपयोगी साबित होता है। यह आँखो की रक्षा तो करता ही है साथ ही व्यक्तित्व निखारने का काम भी करता है।

यदि आँखों से पास की या दूर की चीजें धुंधली दिखाई देती हों तो आँखें चेक करवाकर नंबर वाला चश्मा पहनना पड़ता है। चश्मा

चश्मे कितने प्रकार के – Type of Specs

नंबर वाले चश्मे – Spectacles

आँखों से दूर का या पास का दृश्य धुंधला दिखाई देने की परेशानी हो तो नंबर वाला चश्मा यानि आई ग्लासेज लगाने पड़ते हैं। इन्हे स्पेक्टेकल्स Spectacles या स्पेक्स भी कहा जाता है।

शुरू में चश्मे की जरुरत का पता नहीं लग पाता। बच्चे यदि किसी विशेष दूर की चीज को देखते समय आखँ सिकोड़ कर या थोड़ी आँख मीचकर देखते हों या स्कूल में बोर्ड पर टीचर द्वारा लिखे हुए अक्षर साफ दिखाई ना देते हों तो डॉक्टर से आँखें चेक करवा लेनी चाहिए। यह बच्चों से पूछते रहना चाहिए की उन्हें साफ दिखाई दे रहा है या नहीं।

जरुरत हो तो डॉक्टर के बताये अनुसार चश्मा बनवाकर पहनना चाहिए अन्यथा सिर दर्द , आँखों की थकान , नंबर बढ़ते जाना आदि परेशानी हो सकती है। साफ दिखाई दे इसके लिए नंबर वाले कॉन्टेक्ट लेंस भी बनवाये जा सकते हैं।

वर्तमान में ऐसे कॉन्टेक्ट लेंस उपलब्ध है जिन्हे पहनना आसान है और आँख को नुकसान भी नहीं होता है।

गोगल्स – Gogals

फैशन के लिए पहने जाने वाले चश्मे गॉगल्स Gogals कहलाते हैं। इन्हे पहन कर चेहरे की सुंदरता निखारी जाती है। कभी कभी आँख की किसी परेशानी को छिपाने के लिए भी गोगल्स का उपयोग किया जाता है।

इसके अलावा ये धूल मिट्टी तथा धूप आदि से आँखों की रक्षा करते हैं। ये गोगल्स कई प्रकार के फ्रेम में उपलब्ध है। मेटल या प्लास्टिक फ्रेम दोनों तरह के गोगल्स मिल जाते है। प्लास्टिक के फ्रेम वाले गोगल्स का चलन अधिक रहता है।

पुरुष और महिला दोनों के लिए अलग प्रकार के रंग और डिज़ाइन में मिल जाते है अपनी पसंद के अनुसार इन्हे खरीदा जा सकता है। फैशन के हिसाब से इनका डिज़ाइन और आकार बदलता रहता है। आपके चेहरे पर खूबसूरत दिखे उसी प्रकार के गोगल्स लेने चाहिए।

सन ग्लासेज – Sun Glasses

तेज धूप से होने वाले नुकसान से बचने के लिए सन ग्लासेस Sun Glasses पहने जाते हैं। सूरज की रोशनी में अल्ट्रा वॉइलेट किरणे होती है जो नुकसान देह होती है।

आखें और इनके पास की त्वचा बहुत नाजुक और सवेदनशील होती है , इसलिए इन पर UV किरणों का असर जल्दी होता है। इसके लिए विशेष प्रकार के चश्मे उपलब्ध हैं जो इन किरणों को रोककर आँखों की रक्षा करते हैं।

चश्मा और लेंस – Eye Glasses and lens

गोगल्स या सन ग्लासेज उतने काम नहीं आते जितने नंबर वाले चश्मे यानि आई ग्लासेज काम आते हैं। अतः आई ग्लास बनवाते समय अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इनके लिए अपनी पसंद के अनुसार प्लास्टिक या मेटल फ्रेम चेहरे पर जंचता हो उस आकार का लेकर उसमे नंबर वाले लेंस लगवाए जा सकते हैं।

मेटल वाले फ्रेम ज्यादा उम्र के लोग अधिक पसंद करते हैं और मेच्योर चेहरे पर जंचते भी है। स्कूल या कॉलेज जाने वाले बच्चे  प्लास्टिक के फ्रेम अधिक पसंद करते हैं।

जो भी फ्रेम लें , यह ध्यान रखना जरुरी है कि यह फ्रेम हमेशा पहनना है। अतः बहुत टाइट या ढीला नहीं होना चाहिए तथा कही भी चुभने वाला नहीं होना चाहिए।

फ्रेम का चुनाव करने के बाद लेंस का सही चुनाव करना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है क्योकि आँखों को आराम , सुरक्षा तथा अच्छा दिखाई देना ज्यादा जरुरी होता है। चश्मे के लेंस के क्या फायदे और नुकसान होते हैं तथा चश्मे में कौनसा लेंस लगवाना चाहिए , आइये जानें –

कुछ समय पहले तक आई ग्लासेस कांच से बनते थे। इनका वजन अधिक होता था और गिरने पर तुरंत टूट जाते थे। अब ये प्लास्टिक से बनाए जाते हैं जो बिल्कुल हल्के होते हैं और गिरने पर टूटने का डर भी नहीं होता है।

प्लास्टिक में भी कई प्रकार के लेंस उपलब्ध है। प्लास्टिक के लेंस को कई प्रकार के ट्रीटमेंट देकर अधिक सुविधाजनक बनाया जा सकता है। जैसे एंटी रिफ्लेक्टिव , फोटो क्रोमैटिक आदि। इनके बारे में आगे बताया गया है।

कांच के लेंस – Glass Lens

पहले सभी चश्मे कांच के लेंस से ही बनाये जाते थे। इनसे दिखता बहुत अच्छा था लेकिन टूटने का डर हमेशा रहता था। टूटने पर आँख में चोट लगने का खतरा भी अधिक होता था।

इन्हे विशेष प्रकार की मशीनों पर घिस कर बनाया जाता था जिसमे समय अधिक लगता था। इस काम के लिए विशेष प्रकार के प्रशिक्षित लोगों की जरुरत होती थी। प्लास्टिक के लेंस आने के बाद ये लगभग बंद हो गए हैं।

प्लास्टिक के लेंस – Plastic Lens

कैलिफर्निया की एक कंपनी ने प्लास्टिक के लेंस बनाने की शुरुआत की। ये लेंस पॉलिमर प्लास्टिक CR -39 से बनाये जाते हैं । ये कांच के लेंस से कम वजन के और कम कीमत के होने के कारण तेजी से लोकप्रिय हो गए।

इनकी साफ दिखाई देने की अच्छी क्षमता तथा टूटने का डर नहीं होने के कारण भी ये तेजी से चलन में आ गए। वर्तमान में भी ये प्लास्टिक लेंस ही काम में लिए जाते हैं।

पॉलीकार्बोनेट लेंस – Poly Carbonate Lens

कुछ समय बाद एक नए प्रकार के मजबूत प्लास्टिक के लेंस आये जो सुरक्षा की दृष्टि से हेलमेट आदि में लगाने के लिए बनाये गए थे। इनकी विशेषता देखकर आँखों के लिए बनने वाले चश्मे के लेंस में भी इनका उपयोग होने लगा।

ये CR -39 प्लाटिक के लेंस से ज्यादा मजबूत और हल्के होते हैं। बच्चों के लिए , सेफ्टी ग्लासेस  के लिए तथा स्पोर्ट्स आईवेयर के रूप में ये बहुत अच्छे रहते हैं।

हाई इंडेक्स प्लास्टिक लेंस – High Index Plastic Lens

पतले और वजन में हल्के लेंस की अधिक मांग होने के कारण आधुनिक तकनीक से हाई इंडेक्स प्लास्टिक लेंस बनाये गए। ये लेंस CR -39 की अपेक्षा पतले और हल्के होते हैं। इनका रिफ्रेक्शन इंडेक्स अधिक होता है तथा स्पेसिफिक ग्रेविटी कम होती है।

चश्मे के लेंस की कोटिंग – Lens Coating

चश्मे का लेंस अधिक आरामदायक तथा मजबूत हो और उससे अधिक अच्छा दिखाई दे  इसके लिए विशेष प्रकार की कोटिंग वाले लेंस उपलब्ध हैं। अपनी पसंद से चश्मा बनवाते समय उसमे विशेष प्रकार की कोटिंग वाले लेंस लगवाए जा सकते हैं लेकिन चश्मे की कीमत उसके अनुसार ही बढ़ जाती है। विशेष प्रकार की कोटिंग ये होती हैं –

एंटी-स्क्रैच कोटिंग – Anti Scratch

यदि चश्मे के लेंस पर खरोंचे आ जाती हैं तो साफ दिखने में परेशानी होने लगती है। कांच के लेंस की अपेक्षा कम वजन वाले प्लास्टिक के लेंस पर स्क्रेच आने की संभावना अधिक होती है।

पॉली कार्बोनेट से बने लेंस मजबूत होते है लेकिन दूसरे प्लास्टिक के लेंस पर एंटी स्क्रेच कोटिंग की जाती है ताकि इन पर आसानी से खरोंच ना आये। यह कोटिंग प्लास्टिक को भी कांच जैसा मजबूत बना देती है। इससे खरोंच पड़ने से बचाव होता है।

एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग – Anti Reflective

एंटी रिफ्लेक्टिव कोटिंग से रात के समय साफ दिखाई देने में आसानी होती है। इसे  AR Coating  भी कहते हैं। इस कोटिंग के कारण लेंस में रिफ्लेक्शन नहीं दिखते और सामने वाले को भी लेंस के आरपार बिल्कुल साफ दिखाई देता है। जिससे किसी से बात करते समय आई कांटेक्ट सही तरीके से हो पाता है।

फोटोग्राफ में चश्मा चमकता है , लेकिन इस कोटिंग के होने से फोटोग्राफ में चश्मे का लेंस चमकने की संभावना कम हो जाती है। आधुनिक हाई इंडेक्स वाले लेंस लाइट अधिक रिफ्लेक्ट करते है इसलिए इनमे एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग करवा लेना ठीक रहता है।

अल्ट्रा-वॉइलेट कोटिंग – Ultra Voilet

सूरज की किरणों में हानिकारक अल्ट्रा वॉइलेट किरणे भी होती है जो उम्र बढ़ने पर आँख की कई प्रकार की परेशानी का कारण बन सकती है।

इन किरणों से आँखों को बचाना चाहिए। पॉलीकार्बोनेट तथा हाई इंडेक्स प्लास्टिक से बने लेंस अपनी विशेष बनावट के कारण इन किरणों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन यदि CR -39 प्लास्टिक लेंस ले रहे हो तो UV प्रोटेक्शन के लिए अतिरिक्त कोटिंग की जरुरत पड़ती है।

फोटो क्रोमेटिक – Photo Chromatic

इस प्रकार की सुविधा वाले लेंस में बाहर की रोशनी के हिसाब से लेंस का रंग अपने आप बदल जाता है। यदि आप तेज धूप यानि तेज रोशनी में हों तो लेंस का रंग अपने आप इतना गहरा हो जाता है की लगता है आपने गोगल्स पहने हुए हैं।

कम रोशनी जैसे रात के समय ये लेंस अपने आप बिल्कुल सफ़ेद हो जाते हैं। यह सुविधा सभी प्रकार के लेंस में उपलब्ध हो सकती है लेकिन इसकी अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ती है ।

लेंस की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि लेंस किस प्रकार का है और उसमे कौनसी कोटिंग करवाना चाहते है। जितनी अच्छी क्वालिटी और जितनी अधिक सुविधा लेना चाहेंगे उतनी कीमत अधिक देनी होगी।

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