नाग पंचमी की पूजा और कहानी – Nag Panchmi Pooja and katha

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नाग पंचमी Nag Panchami या भैया पंचमी सावन महीने की पंचमी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस दिन महिलायें भाई तथा परिवार की खुशहाली के लिए करती हैं। नाग देवता की पूजा करती है और उन्हें दूध अर्पित किया जाता है।

नाग पंचमी के दिन जिन नाग देवताओं की पूजा की जाती है वो इस प्रकार हैं –

वासुकि , कालिया , शेषनाग ,  कार्कोटक , मणिभद्रक  , धृतराष्ट्र , शंखपाल , तक्षक आदि।

नाग पंचमी की पूजा की तैयारी एक दिन पहले ही शुरू हो जाती है। चौथ के दिन चना , बाजरा , मूंग , मोठ आदि भिगो दिया जाता है। पूजा वाले दिन के लिए भोजन भी चौथ के दिन ही बना लिया जाता है। पूजा के बाद यह ठंडा भोजन खाया जाता है।नाग पंचमी

नाग पंचमी की पूजा विधि – Nag Panchami Pooja Vidhi

—  सुबह जल्दी उठकर घर की सफाई और स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।

—  दीवार पर गेरू पोतकर पूजा करने का स्थान बनायें।

—  कच्चे दूध में कोयला घिस कर उससे गेरू से बने स्थान पर घर जैसी आकृति और उसके अंदर पांच फन वाले नाग देवता की आकृति बनायें।

—  अथवा घर के दरवाजे के दोनों तरफ पांच फन वाले नाग देवता की आकृति बनायें।

—  नाग देवता बनाने का एक अन्य तरीका यह है की एक रस्सी में सात गांठ लगा लें। इसे पाटे पर रखकर उसकी पूजा की जा सकती है।

—  अब यदि संभव हो तो नाग की बमई पर एक कटोरी दूध चढ़ा कर पूजा करें ।

—  बमई ना हो तो दीवार पर बने या पाटे पर बिराजे नाग देवता की पूजा भी की जा सकती है।

—  पूजा के लिए रोली ,अक्षत से टीका करके मोली , पुष्प ,गंध आदि अर्पित करें।  भीगा अनाज , धान , खील , दूर्वा , खीर या दूध , मिठाई आदि अर्पित  करें।

—   नागपंचमी की कथा सुने। कथा आगे दी गई है।

—  आरती करें।

—  सास या जेठानी को भीगे अनाज , मिठाई तथा यथा शक्ति रूपये का बायना पैर छूकर दें और आशीर्वाद लें।

—  नागपंचमी के दिन धरती नहीं खोदनी चाहिए।

नाग पंचमी की कथा – Nag panchami ki kahani

एक सेठ के सात लड़के थे। सातों विवाहित थे। सबसे छोटे लड़के की पत्नी सुशील और बुद्धिमान थी। उसका कोई भाई नहीं था।

एक दिन बड़ी बहू सभी को साथ लेकर मिट्टी लाने के लिए गई। वे खुरपी से मिट्टी खोदने लगी। तभी वहां एक सांप निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने कहा-  इसने हमारा क्या बिगाड़ा है ? इस बेचारे निरपराध को मत मारो ।

यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा। सांप एक तरफ जाकर  बैठ गया । छोटी बहू ने उससे कहा- हम अभी लौट कर आते  हैं तुम यहीं रुकना , जाना मत। यह कहकर वह सबके साथ घर चली गई और वहाँ कामकाज लगने से भूल गई की उसने सांप को रुकने को कहा है।

दूसरे दिन याद आने पर वहां गई तो सांप वहीं था। वह बोली मुझे क्षमा करना भैया , मुझसे भूल हो गई। सांप ने कहा – भैया कहा है तो छोड़ देता हूँ।आज से तू मेरी बहन है , जो इच्छा हो मांग ले। उसने कहा – मेरा कोई भाई नहीं था। मुझे भाई मिल गया।

कुछ दिन बाद वह सांप मनुष्य का रूप लेकर बहन के घर आया और कहा – मेरी बहन को मेरे साथ भेजो। सांप ने विश्वास दिलाया कि वह उसका दूर के रिश्ते का भाई है। रास्ते में बहन को अपने वही सांप होने की बात बताई। सांप के घर पहुँच कर वहाँ का ठाट बाट देखकर हैरान रह गई।

एक दिन सांप की माँ ने कहा- ‘मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ , तू अपने भाई को दूध पिला देना। उसने दूध दिया वह गर्म था सांप का मुंह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत गुस्सा हुई।

सांप ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सांप और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र आदि देकर उसके घर पहुँचा दिया।

इतना सारा धन देखकर बड़ी बहू ईर्ष्या से बोली – भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे अधिक धन लाना चाहिए था । सांप ने यह सुना तो उसने और धन लाकर दिया। सांप ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था।

उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहाँ आना चाहिए। राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि ‘महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो’। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया।

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने भाई को याद किया और आने पर कहा – भैया ! रानी ने मेरा हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए।

सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सांप बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी। यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो।

सेठजी डरते हुए छोटी बहू को साथ लेकर वहां पहुंचे।  राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दण्ड दूंगा। छोटी बहू बोली- राजन ! क्षमा करें , लेकिन यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सांप बन जाता है।

यह सुनकर राजा ने वह सांप बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना तो हार हीरे-मणियों का हो गया।

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी बहू अपने हार और धन सहित घर लौट आई।

उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति से कहा उसकी पत्नी के पास ना जाने कहाँ से इतना  धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है, वह अपने भाई सांप को याद करने लगी।

तब उसी समय सांप ने प्रकट होकर कहा- जो मेरी बहन के आचरण पर संदेह करेगा उसे मैं खा लूँगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियाँ सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।

बोलो नाग देवता की …..जय !!!

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