वैसी वाली फिल्म का मतलब आप समझ ही गए होंगे। जो सिर्फ बड़ों के लिए होती हैं और चुपके चुपके देखी जाती हैं। जब भी ऐसी फिल्म देखी जाती है तो देखने वाले के मन में कुछ विचार जरूर आते है जैसे – ये तो बहुत देर तक कर लेते हैं। इसका तो बहुत बड़ा है। ये तो बहुत एन्जॉय कर रहे हैं। दोनों जगह में बड़े मजे से करते हैं। काश…..
फिल्म देखने वाले के मन में ऐसे विचार आएँ , यही फिल्म बनाने वालों का उद्देश्य होता है। इसी के लिए वे प्लान बनाते है। वैसे लोगों को ही काम देते हैं , उसी तरह की शूटिंग करते हैं और फिल्म में कांट छांट करके शानदार प्रस्तुति देते हैं। ऐसी सफल फिल्में , फिल्म देखने वाले को स्वप्नलोक में ले जाती हैं और इसलिए उसमें मजा आता है।
लेकिन यही चीज समस्या बन जाती है जब लोग स्वप्नलोक और असलियत में फर्क भूल जाते हैं और खुद की तुलना उस स्वप्नलोक से करने लगते है।
खुद वैसा बनना चाहने लगते हैं या अपने पार्टनर को वैसा करते देखना चाहने लगते हैं। जो कि असंभव सा होता है क्योंकि जो आपने देखा वह जो हुआ उसका सिर्फ थोड़ा सा ही हिस्सा है। जो नहीं दिखा , वह सच भी जान लेना चाहिए।
जैसे आपने देखा हीरो बहुत अधिक ऊंचाई से कूदा और सही सलामत जमीन पर पैर टिके और दौड़ना शुरू। आपको लगेगा मैं भी ऐसा कर सकता हूँ लेकिन यदि आपने किया तो सीधे हॉस्पिटल में नजर आयेंगे । इसलिए किसी भी फिल्म की नक़ल करना सही नहीं होता।
एक प्रसिद्ध वेबसाईट के अनुसार वैसी फिल्में बनाने वाले एक डायरेक्टर द्वारा बताई गई कुछ बातें दूसरे नजरिये से सोचने पर मजबूर कर देती हैं। जानिए वो कौनसी बातें है। शायद आपको इससे फायदा और मदद मिले –
कितना बड़ा
ऐसी अधिकतर फिल्मों में आदमी का बहुत बड़ा होता है। फिल्म देखने वाला इसे देखकर प्रभावित हो सकता है। देखने वाले पुरुष के मन में हीनता की भावना आ सकती है। लेकिन सच यह है की उसका कुछ फायदा नही है। बड़े साइज़ से फिल्म में काम करने वाली महिला को सबसे ज्यादा परेशानी होती है।
बहुत कम महिला ऐसी होती हैं जो इतने बड़े साइज़ से समझौता कर पाती हैं या उसमे आनंद प्राप्त कर सकती हैं। फ़िल्म में काम करने वाली महिला को परेशानी होने पर अगर चेहरे पर दर्द के भाव उभर आते है , ऐसे सीन काट कर हटा दिए जाते हैं।
महिला को चेहरे पर वही भाव दर्शाने की मजबूरी होती है , जो फिल्म देखने वाले को अच्छा लगे। और वे ऐसा करती भी हैं चाहे कितनी भी परेशानी क्यों न हो। यानि अगर आप सोच रहे हो बड़े से उसे ज्यादा अच्छा लगता होगा तो ये आपकी भूल है।
कितनी देर तक
फिल्म देखते समय ऐसा लगता है कि वो सब बहुत देर तक लगातार चलता रहता है। लेकिन इसमें कैमरा शुरू होने से पहले और कैमरा बंद होने के बाद के हालत नहीं दिखाई पड़ते। फिल्म में काम करने वाले 95 % लोग बड़ा करने के लिए दवा या इंजेक्शन का सहारा लेते हैं और जो नहीं लेते वे परफॉर्म ही नहीं कर पाते।
बीच बीच में खाने पीने के लिए , साँस कंट्रोल करने के लिए , वापस बड़ा होने आदि के लिए रुकते हैं। जरुरत पड़ने पर दवा या इंजेक्शन दुबारा लेना पड़ता है।
इसके अलावा बाथरूम जाने या क्रीम आदि लगाने के लिए भी रुकते हैं लेकिन यह सब फिल्म में नहीं दिखता। यानि पुरुष या महिला जितना दिखता है उतना लगातार नहीं कर रहे होते हैं। इतना ज्यादा करेंगे तो सेंसेशन ख़तम हो जाती है। कभी कभी ज्यादा दवा लेने से असर होना बंद हो जाता है और बड़ा होना ही बहुत मुश्किल हो जाता है।
पीछे वाले में कितने आराम से
फिल्म देखने से ऐसा लगता है दूसरे वाले में आराम से किया जा सकता है। लेकिन असल में उसके लिए महिला को बहुत सी चीजें करनी पड़ती हैं। कई कई बार वहाँ की सफाई करानी पड़ती है कभी अन्य उपचार लेने पड़ते है ताकि गन्दगी बाहर न निकल आये।
10 -12 घंटे पहले खाना पीना बंद करना पड़ता है। ऐसा नहीं हो तो जो दिखेगा वह देखने लायक नहीं होगा। तकलीफ से बचने के लिए सुन्न करने वाली विशेष दवा और क्रीम का उपयोग किया जाता है।
इसके अलावा उस जगह सबसे अधिक कीटाणु पाए जाते हैं जो कई बीमारियों का कारण बन सकते हैं। इस द्वार के साथ छेड़छाड़ महँगी पड़ सकती है। यहाँ होने वाली जरा सी भी तकलीफ जीना दुश्वार कर सकती है।
बिना सोचे समझे क्षण भर के उन्माद में नक़ल करने का गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है। इसलिए प्राकृतिक व्यवस्था में संतुष्ट रहें और रहने दें।
कितना एन्जॉय
अधिकतर वैसी फिल्मो में काम करने वाले लोगों की पहली जरुरत होती है – पैसा । ना कि आजादी या आनन्द । कुछ को वह काम करना बिल्कुल पसंद नहीं होता। कुछ को पार्टनर पसंद नहीं होता। दर्द या अन्य परेशानी हो सकती है। एन्जॉयमेंट नहीं हो तो भी उन्हें करना पड़ता है। अच्छी एक्टिंग की वजह से ही फिल्म देखने वाले को आनंद आता है। तभी पैसा बनता है।
बिना अवरोध करते हैं उन्हें कुछ नहीं होता
ऐसी फ़िल्मो में काम करने वाले सभी कलाकारों का हर सप्ताह बीमारी के लिए टेस्ट करवाया जाता है तो भी कुछ बीमारी तो लग ही जाती है। बार बार दवा लेने से कभी कभी तो दवा का असर होना भी बंद हो जाता है। यह किसी विशेष को नहीं होता। जो जितना ज्यादा बार बिना अवरोध के करता है उसे उतनी ही बीमारी लगने की संभावना बढ़ जाती है। उन्हें देखकर बिना अवरोध शुरु नहीं होना चाहिए।
अतः विवेक से काम लेना चाहिये। प्रकृति की महान देन का सदुपयोग करते हुए ही आनंद लें। नक़ल करके दुरूपयोग करने से सिवा नुकसान के कुछ हासिल नहीं होता।
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