आमलकी एकादशी व्रत कथा Aamalaki Ekadashi Vrat Katha

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आमलकी एकादशी Amalaki ekadashi फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। इसे आंवला एकादशी Amla Ekadashi या रंगभरनी एकादशी Rang bharni ekadashi के नाम से भी जाना जाता है।

आमलकी का मतलब होता है ‘आंवले का पेड़ ‘। आंवला एक चमत्कारी औषधीय फल है। आज के दिन व्रत करने के अलावा आंवले के पेड़ का रोपण करना बहुत शुभ होता है। इससे घर में सुख समृद्धि बनी रहती है तथा रोग शोक आदि दूर होते हैं।

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आमलकी एकादशी के दिन आंवले का महत्व अधिक बढ़ जाता है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु को आंवले का वृक्ष प्रिय होता है। इसीलिए इस दिन पूजा में विष्णु जी को आंवले अर्पित किये जाते हैं।

पुराणों की कथा के अनुसार इसी दिन सृष्टि के आरंभ काल में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी। ब्रह्माजी जब विष्णु जी के नाभि कमल से उत्पन्न हुए तो उन्हें जिज्ञासा हुई कि उनकी उत्पत्ति कैसे हुई है। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्रह्माजी तपस्या में लीन हुए तो भगवान विष्णु प्रकट हुए ।

विष्णु भगवान को सामने देकर ब्रह्माजी खुशी से रोने लगे। उनके आंसू भगवान विष्णु की चरणों में गिरने लगे। उनकी इस भक्ति-भाव को देखकर भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी के इन आंसुओं से फिर आंवले के पेड़ की उत्पत्ति हुई ।

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आमलकी एकादशी का व्रत सभी व्रतों में उत्तम और मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। आंवला एकादशी की कहानी इस प्रकार है –

आमलकी एकादशी व्रत कथा

aamalki ekadashi ki kahani

राजा मान्धाता ने गुरु वशिष्ठ से पूछा – हे गुरुदेव ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो किसी व्रत का विधान कहो जिससे मेरा कुछ कल्याण हो।

वशिष्ठ जी ने कहा – हे राजन ! सब व्रतों में उत्तम और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाला आमलकी एकादशी का व्रत है। इस व्रत का वर्णन मैं तुम्हारे सामने करता हूँ।

फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम ही आमलकी एकादशी है।  इस व्रत को करने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं इस विषय पर तुम्हे एक कथा सुनाता हूँ। ( amalki ekadashi ki katha….)

वशिष्ठ जी सुनाने लगे –

हे राजन !  वैदिश नाम के नगर में चैत्ररथ नाम का चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। वह बड़ा विद्वान् और धार्मिक विचार वाला था। उस नगर में सदैव वेद ध्वनी गूंजती रहती थी। वहां कोई भी पापी , दुराचारी , नास्तिक , दरिद्र या कंजूस नहीं था। वहां के सब लोग वृद्ध , वयस्क , बालक आदि सभी एकादशी का व्रत किया करते थे और सभी विष्णु भक्त थे।

एक समय फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी को राजा तथा समस्त प्रजा ने हर्ष सहित एकादशी का व्रत किया। राजा ने प्रजाजनों के साथ मंदिर में जाकर पूर्ण कुम्भ स्थापित किया। धूप दीप , नैवेद्य आदि से पूजन किया।

पूजन करते समय वे इस प्रकार कहने लगे , हे धात्री ! (  यहाँ धात्री का अर्थ आंवले का पेड़ है ) तुम ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हो , तुम ब्रह्म स्वरुप हो।  हे देवी ! तुम समस्त पापों को नष्ट करने वाली हो , तुमको बार बार नमस्कार है।

उस देव – गृह मे सबने रात्रि जागरण किया। उसी रात्रि को एक बहेलिया , जो जीव हिंसा करके अपने कुटुंब का पालन करता था। भूख प्यास से व्याकुल हो जागरण देखने के लिए मंदिर के एक कोने में आकर बैठ गया था। वह वहां पर होती हुई एकादशी व्रत की कथा और महत्त्व को सुनता रहा। ( आमलकी एकादशी व्रत कथा ….)

इस तरह उस बहेलिये ने भी अन्य सभी लोगों के साथ जागरण कर रात्रि व्यतीत की। प्रातःकाल जब सब लोग अपने अपने घर को चले आए तो वह बहेलिया भी अपने घर को चला गया। कुछ समय बाद उस बहेलिये की मृत्यु हो गई।

बहेलिये ने आमलकी एकादशी के व्रत तथा जागरण के प्रभाव से राजा विदुरथ के घर जन्म लिया। उसका नाम वसूरथ रखा गया। जब वह बड़ा हुआ तो धन धान्य से युक्त होकर चतुरंगिनी सेना के साथ दस सहस्र गावों का पालन करने लगा।

वह तेज में सूर्य के समान , कीर्ति में चन्द्रमा , वीरता में विष्णु भगवान और क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह विष्णु भक्त , सत्यवादी , कर्मवीर और अत्यंत धार्मिक था।

एक दिन राजा वसूरथ वन में आखेट के लिए गया। देवयोग से वह रास्ता भटक गया और थककर एक वृक्ष के नीचे सो गया। उसी समय वहां पर कुछ पहाड़ी म्लेच्छ ( अधर्मी , दुष्ट ) आ गए। उन्होंने राजा को देखा तो ” मारो” , ” मारो ” ऐसे शब्द कहकर राजा को मारने के लिए टूट पड़े। ( आमलकी एकादशी व्रत कथा ….)

वे राजा को अकेला देखकर कहने लगे कि इसी दुष्ट राजा ने हमारे माता पिता , पुत्र , पौत्र आदि सम्बन्धियों को मार कर देश से निकाला है। अतः इसे मार देना चाहिए। इस प्रकार कहकर वे कई प्रकार के शस्त्रों से राजा पर प्रहार करने लगे। लेकिन उनके द्वारा चलाये हुए अस्त्र शस्त्र राजा के शरीर पर पड़ते ही नष्ट हो जा रहे थे।

म्लेच्छों द्वारा छोड़े गए अस्त्र शस्त्र वापस उन्ही पर प्रहार करने लगे जिसके कारण म्लेच्छ खुद ही मूर्छित हो होकर गिर रहे थे। उसी समय राजा के शरीर से अत्यंत सुंदर वस्त्र आभूषण से युक्त दिव्य स्त्री प्रकट हुई। वह अग्नि के समान लाल लाल आँखों वाली , टेढ़ी भृकुटी किये , काल के समान लग रही थी। ( amalki ekadashi ki katha….)

उस स्त्री ने समस्त म्लेच्छों को मार डाला। राजा जब निद्रा से जागा तो उसने सब म्लेच्छों को मरा हुआ देखकर विचार किया कि इन शत्रुओं को मारने वाला कौन है , मेरा इस वन में ऐसा कौन हितेषी रहता है जिसने इन्हें मारा है।

जब राजा ऐसा विचार कर रहा था , तभी आकाशवाणी हुई कि हे राजन ! संसार में तेरी रक्षा विष्णुजी के अलावा और कौन कर सकता है। उस आकाशवाणी को सुनकर वह राजा प्रसन्न होकर अपने नगर को वापिस चला गया और सुख पूर्वक राज्य करने लगा। ( आमलकी एकादशी व्रत कथा ….)

महर्षि वशिष्ठ ने कहा –हे राजा मान्धाता ! यह सब आमलकी एकादशी के व्रत के प्रभाव से हुआ था। जो मनुष्य आमलकी एकादशी का व्रत करते हैं , वे निश्चय ही प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त करते हैं।

बोलो विष्णु भगवान की … जय !!!

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