गोगा नवमी व गोगामेड़ी , ददरेवा में गोगाजी का मेला – Gogaji ka mela

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गोगा नवमी Goga navmi भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि अर्थात जन्माष्टमी के अगले  दिन मनाई जाती है। इसे गुग्गा नवमी Gugga Navmi भी कहते हैं। इस दिन गोगाजी की पूजा की जाती है। इसके अलावा नाग देवता की पूजा अर्चना भी की जाती है।

गोगाजी को गोगा पीर Goga peer , गुग्गा वीर Gugga veer , जाहिर वीर jahar veer आदि नामों से भी जाना जाता है। हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों गोगाजी को मानते हैं। मुस्लिम उन्हें जाहर Jahar peer पीर और गोगा पीर goga pir के नाम से पुकारते हैं।

माना जाता है कि गोगाजी की पूजा करने से सर्प से रक्षा होती है। इस दिन नागों की पूजा भी की जाती है। गोगा जी का स्थान सामान्यतया खेजड़ी के वृक्ष के नीचे होता है। कहावत है – ” गाँव गाँव खेजरी , गाँव गाँव गोगो ”

गोगा नवमी के दिन उनकी कथा गाने वाली मंडलियाँ घर घर जाकर गोगा जी का गुणगान करती हैं , कुछ जगह पंचमी के दिन Goga panchami की पूजा की जाती है । कुछ लोग रक्षाबंधन पर बाँधी गई राखी गोगा जी के समक्ष खोलते हैं।

गोगाजी कौन थे

Who was gogaji

गोगाजी चौहान वंश के पृथ्वी राज चौहान के बाद अत्यंत वीर , प्रतापी और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का जन्म गुरु गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। खुद गोगाजी भी गुरु गोरखनाथ के प्रमुख अनुयायी थे। गोगाजी के पिता का नाम जैबर सिंह और माँ का नाम बाछल देवी था। उनका राज्य सतलज से हांसी ( हरियाणा ) तक फैला हुआ था।

गोगाजी जी का आदर्श व्यक्तित्व ने लोगों पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ा है। राजस्थान के मुख्य छह सिद्धों में से पहला स्थान गोगाजी को दिया जाता है।  

गोगाजी का मेला – Goga ji ka mela

गोगाजी का विशाल मेला राजस्थान के दो स्थानों पर आयोजित होता है – हनुमान गढ़ जिले के गोगामेड़ी घूरमेड़ी में तथा चुरू जिले के ददरेवा में।

गोगामेड़ी में गोगाजी मेला

gogamedi mela

गोगाजी का मुख्य स्थान गोगामेड़ी घूरमेड़ी ghoormedi ( राजस्थान ) के हनुमानगढ़ जिले में नोहर के पास स्थित है।  यहाँ सावन पूर्णिमा से मेला शुरू हो जाता है। वैसे तो पूर्णिमा से ही लोग आने शुरू हो जाते हैं लेकिन गोगा पंचमी Goga Panchami तथा गोगा नवमी Goga navmi के दिन अधिक संख्या में आकर लोग दर्शन का लाभ उठाते हैं।

गोगामेड़ी में गोगाजी का समाधी स्थल है। इसके अलावा गोगामेड़ी में गुरु गोरख नाथ टीला भी है। गोगामेड़ी धाम हिन्दू व मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोगों की आस्था का केंद्र है। यहाँ गोगाजी और गुरु गोरखनाथ के प्रति भक्ति की अविरल धारा बहती है। लोग गोरखनाथ टीले पर शीश नवाते हैं फिर गोगाजी की समाधी पर ढ़ोक लगाते हैं।

ददरेवा का गोगाजी मेला

Dadreva gogaji mela

चुरू जिले में ददरेवा गाँव गोगाजी की जन्म स्थली है। इसे बड़ी गोगामेडी Badi Gogamedi के नाम से भी जाना जाता है जिसमे हजारों लोग शामिल होकर आस्था प्रकट करते हैं। राजस्थान , दिल्ली , पंजाब , हरियाणा , यू पी , बिहार से लोग  जाहर वीर गोगा जी के दर्शन के लिए आते हैं। लोग निशान , जेवड़ी ( रस्सी ) कहे जाने वाले सांप , गोयरा आदि साथ में लाकर मेले की शोभा बढ़ाते हैं।

ददरेवा आकर लोग ढ़ोक लगाने के साथ गोरखनाथ जी तथा गोगा जी की जीवनी अपनी भाषा में गाकर सुनाते हैं। वाद्य यंत्रों में डैरूं व कांसी का कचौला विशेष रूप से बजाया जाता है।

घर पर गोगा जी की पूजा

Gogaji ki pooja ghar par

कुछ लोग घर पर गोगोजी की पूजा करते हैं। इसके लिए गोगाजी की तस्वीर या मूर्ति , पूजा के शुद्ध स्थान पर स्थापित की जाती है। इसके बाद रोली , मौली , अक्षत , पुष्प , धूप दीप , दक्षिणा आदि से की जाती है।  नारियल चढ़ाया जाता है तथा खीर , लापसी , पुड़ी , पुए आदि का श्रद्धा अनुसार भोग लगाया जाता है।

कुछ महिलाएं घर की दीवार पर सर्प की आकृति बनाकर पूजा करती हैं।

माना जाता है कि किसी के घर में सर्प दिख जाये तो गोगा जी को कच्चा दूध अर्पित करने से वह बिना कोई नुकसान किये चला जाता है।  इसके अलावा मान्यता है कि जिस घर में गोगा जी की पूजा होती है उस घर के लोगों को सर्प नहीं काटता है।

गोगाजी की कथा

Gogaji katha

गोगाजी की माँ बाछल देवी गुरु गोरख नाथ जी की परम भक्त थी परन्तु वह निसंतान थी। एक बार गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों के साथ उनके राज्य में आये और उन्होंने शिष्य को भिक्षा लेने भेजा। गोगाजी की माँ उन्हे बहुत सा धन देना चाहती थी लेकिन उन्होंने धन लेने से मना कर दिया और सिर्फ थोडा सा अनाज माँगा।

रानी ने अहंकार वश कहा मेरे यहाँ अनाज का बहुत बड़ा भंडार है , कैसे ले जाओगे ? शिष्य ने अपना भिक्षा पात्र आगे बढ़ाया। रानी का पूरा अनाज का भंडार उसमे समा गया।

राज्य का पूरा अनाज समाप्त होने से रानी घबराकर उनके आगे नतमस्तक हो गई और क्षमा याचना करने लगी। साथ ही रानी ने संतान ना होने का दुःख उनके सामने रखा , शिष्य ने उन्हें गुरु जी से मिलने की सलाह दी।

गुरूजी ने उन्हें गुग्गल नामक फल देकर भेजा और आशीर्वाद दिया कि उन्हें नागों को वश में करने वाला वीर पुत्र प्राप्त होगा जो शिरोमणी होगा और पूजा जायेगा।

फल खाने के बाद बाछल देवी गर्भवती हुई और फिर गोगाजी का जन्म हुआ जिनका नाम फल के नाम पर रखा गया। गोगाजी ने बड़े होकर समाज के उत्थान और जरुरत मंद लोगों की मदद के लिए बहुत से कार्य किये। उनमें सर्पों को वश में करने की विशेष योग्यता थी।

जय गोगा वीर …जय गोरखनाथ !!!

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