जया एकादशी व्रत कथा और लाभ – Jaya Ekadashi Vrat Katha

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जया एकादशी Jaya Ekadashi माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। जया एकादशी बहुत पूण्यदायक मानी जाती है। इसे भीष्म एकादशी Bhishm Ekadashi के नाम से भी जाना जाता है।

जया एकादशी व्रत का तरीका

Jaya Ekadashi Vrat Vidhi

इस दिन धूप , दीप , नैवेद्य , पंचामृत आदि से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा निराहार व्रत रखा जाता है। एक दिन पहले यानि दशमी तिथि को भी एक ही समय सात्विक भोजन करके व्रत रखा जाता है। द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन करवाकर , उसे दान दक्षिणा देकर व्रत का पारण किया जाता है।

कहा जाता है कि युधिष्ठिर को भगवान श्रीकृष्ण ने माघ महीने की पूजा के लिए जया एकादशी का दिन बताया था तथा जया एकादशी की कथा सुनाई थी।

जया एकादशी व्रत के लाभ

Jaya Ekadashi vrat labh

माना जाता है कि इस व्रत को करने से आस पास किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का डर हो तो दूर होता है। साथ ही भूत-प्रेत या पिशाच योनी में जन्म होने का भय समाप्त होता है। इसके अलावा यह व्रत करने से माता का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

जया एकादशी की कथा

Jaya Ekadashi Vrat Katha

एक दिन स्वर्गलोक का राजा इंद्र नंदनवन में अप्सराओं के साथ नाच गान में व्यस्त था। गन्धर्व लोग भी वहाँ उपस्थित थे।  पुष्पदंत नामक एक प्रसिद्द गन्धर्व का गान चल रहा था। तभी वहाँ चित्रसेन नाम का गन्धर्व अपनी पत्नी और पुत्री मालिनी के साथ आया। मालिनी का पुत्र पुष्पवान और पुष्पवान का पुत्र माल्यवान भी वहाँ उपस्थित थे।

माल्यवान पर एक पुष्पवती नाम की सुंदर गन्धर्वी मोहित हो गयी। उसने अपने रूप , सौन्दर्य और हाव भाव से माल्यवान को अपने वशीभूत कर लिया। माल्यवान भी पूर्ण रूप से उस पर मोहित हो गया। दोनों काम देव के वशीभूत होते हुए भी गान कर रहे थे।

मन स्थिर नहीं होने के कारण वे गलत गान करने लगे। इंद्र यह देख भी रहा था और समझ भी रहा था। उसे अपना अपमान महसूस हुआ। उसने श्राप देते हुए कहा –” तुम दोनों मृत्यु लोग में स्त्री पुरुष होकर पिशाच रूप धारण करो ”

श्राप के प्रभाव से वे हिमालय पर्वत पर पिशाच रूप धारण करके स्त्री पुरुष के रूप में दुःख भोगने लगे। उस समय उन्हें गंध –रस और स्पर्श का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा। कभी तो शरीर की जलन के कारण उन्हें निद्रा भी नहीं आती थी। कभी कड़ाके की सर्दी सहन करनी पड़ती थी। इस तरह उनके दिन व्यतीत होने लगे।

पिशाच में पिशाचिनी से कहा – ” ना जाने हमने पूर्व जन्म में कौनसे कर्म किये थे ,जो पिशाच योनी को प्राप्त होकर इन यातनाओं को सहन करना पड़ रहा है ” । इस तरह के कई विचार उनके मन में उठते थे। दुःख सहते हुए इसी प्रकार उनका जीवन व्यतीत हो रहा था।

माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन आया। देवयोग से उन्होंने उस दिन , पूरे दिन ना तो कुछ खाया और ना ही जल पिया और उनसे कोई पाप कर्म भी नहीं हुआ।

रात को सर्दी के कारण दांत किटकिटाते एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर जागरण करते हुए उन्होंने पूरी रात व्यतीत की। इसके प्रभाव से द्वादशी के दिन प्रातःकाल भगवान नारायण की कृपा से दोनों की पिशाच देह छूट गई और वे वापस अपने गन्धर्व और अप्सरा के रूप में आ गये। सुन्दर वस्त्र व आभूषण से अलंकृत होकर वे स्वर्ग लोक में वापस आ गए।

स्वर्ग लोक में आकर उन्होंने देवराज इंद्र को प्रणाम किया तो उन्हें देखकर इंद्र को बड़ा आश्चर्य हुआ।

इंद्र ने पूछा – तुम दोनों ने अपनी पिशाच देह से कैसे छुटकारा पाया ? मुझे बताओ।

माल्यवान ने कहा –

हे सुरराज ! भगवान् विष्णु की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पूण्य फल से हमारी पिशाच देह छुट गई है।

यह सुनकर इंद्र ने कहा –

हे माल्यवान ! जया एकादशी का व्रत करने और विष्णु के प्रभाव से तुम पवित्र व शुद्ध हो गए हो। इसलिए अब तुम पुष्पवती के साथ यहाँ रहकर विहार कर सकते हो।

श्री कृष्ण ने कहा – हे युधिष्ठिर ! जो लोग भक्ति पूर्वक इस जया एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें समस्त बुरी योनियों से मुक्ति मिलती है तथा स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

“ कथा समाप्त “

बोलो विष्णु भगवान की …. जय !!!

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