पेट,आमाशय कैसे काम करता है समझें सरल भाषा में – Stomach

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पेट,आमाशय यानि Stomach पाचन तंत्र का मुख्य हिस्सा है। वैसे उदर Abdomen वाली जगह को भी पेट ही कहा जाता है पर उस जगह आंतें होती हैं। पेट में जलन, पेट भर गया जैसे शब्द असल में आमाशय से सम्बन्ध रखते है।

जब भी हम खाना खाते हैं तो वह आहार नली से होता हुआ सीधा आमाशय में पहुँचता है। भोजन को पचाने तथा उसमे से पोषक तत्व ग्रहण करके शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाये रखने में आमाशय तथा शरीर के कई अंगों की अलग अलग भूमिका होती है। आइये जानें आमाशय का क्या कार्य होता है।

आमाशय कहाँ स्थित होता है

Stomach location

आमाशय एक लचीला अंग होता है। इसका आकर अंग्रेजी के J ( जे ) अक्षर जैसा होता है। यह भोजन नली oesophagus तथा छोटी आंत के बीच स्थित होता है। आमाशय उदर Abdomen में बायीं तरफ ऊपरी हिस्से में स्थित होता है।

इसके दायीं तरफ लीवर होता है जिसके नीचे के भाग में पित्ताशय Gall Bladder होता है। आमाशय  Stomach के पीछे की तरफ अग्नाशय Pancreas स्थित होता है तथा इसके बायीं तरफ तिल्ली  spleen होती है जिसे प्लीहा भी कहते हैं ।

भोजन नली और आमाशय जिस स्थान पर मिलते हैं उसे इसोफेगल स्फिंक्टर oesophagel sphincter कहते हैं।यह स्थान हृदय के बहुत पास होता है। ज्यादा खाना खाने पर पेट का एसिड भोजन नली में पहुंच कर दर्द और जलन पैदा कर सकता है। इसीलिए एसिडिटी और हृदय रोग के लक्षण एक जैसे महसूस होने की सम्भावना होती है।

आमाशय से निकल कर भोजन छोटी आंत में जाता है। आमाशय तथा छोटी आंत जिस स्थान पर जुड़ते है वह स्थान पायलोरिक स्फिंक्टर pyloric sphincter  कहलाता है।

पेट में खाना कैसे पचता है – How Stomach Works

जब भोजन को चबाकर निगला जाता है तो यह भोजन नली से होता हुआ सीधा आमाशय Stomach में चला जाता है। जब भोजन आमाशय में पहुँचता है तो आमाशय में मौजूद ग्रंथिया भोजन का विश्लेषण करके आवश्यकता के अनुसार पाचक रस का स्राव तेजी से शुरू कर देती हैं।

इससे पाचन की आगे की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पेट का यह रस  कुछ जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इस पाचक रस में मुख्य रूप से हाइड्रोक्लोरिक एसिड तथा पेप्सिन नामक एंजाइम होते हैं। प्रोटीन को पचाने के लिए पेप्सिन आवश्यक होता है।

इस रस में मौजूद एमाइलेज नामक एंजाइम कार्बोहाइड्रेट को पचाता है तथा लाइपेज नामक एंजाइम वसा यानि फैट को पचाता है। एक अन्य एंजाइम जो रेनिन कहलाता है पेट में दूध को फाड़ने का काम करता है।

यदि भोजन करने के साथ पानी पीते हैं तो यह अम्ल तथा एंजाइम अपना काम सही तरीके से नहीं कर पाते और पाचन क्रिया धीमी हो जाती है इसलिए भोजन के साथ पानी नहीं पीना चाहिए।

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पेट में रस का स्राव बहुत सी  बातों पर निर्भर होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार भोजन की गंध तथा अच्छे भोजन को देखने मात्र से पेट में रस का स्राव शुरू हो सकता है। यदि खाना स्वादिष्ट नहीं होता है तो भूख मर जाती है। उसका पाचन भी सही तरीके से नहीं हो पाता है।

आमाशय की दीवारें संकुचन की मदद से भोजन को हिला डुला कर मथ देती हैं और रस को उसमे अच्छी तरह मिला देती हैं।  भोजन में रस के अच्छी तरह मिल जाने पर यह नर्म और अवशोषण के लायक हो जाता है जिसे काइम Chyme कहते हैं।

इसे आमाशय धीरे धीरे छोटी आंत में खिसका देता है। भोजन की मात्रा तथा गुणवत्ता के अनुसार पौन घंटे से तीन घंटे में आमाशय भोजन को काइम में परिवर्तित करके छोटी आंत में पहुंचा देता है।

यदि खाना सुपाच्य है यह दो से तीन घंटे में पेट से निकल जाता है और पेट खाली हो जाता है। अब इसमें फिर से खाना ले जाया जा सकता है। यदि गरिष्ठ या देर से पचने वाला भोजन होता है तो इसमें अधिक समय लगता है।

छोटी आंत में लिवर , पित्ताशय , अग्नाशय आदि से होने वाले स्राव भोजन में मिलते है और इसे पूर्ण रूप से आँतों द्वारा अवशोषित होने लायक बना देते हैं।

लीवर से हरे रंग का तरल पित्त स्रावित होता है। इससे वसा का पाचन होता है। लीवर के कार्य और महत्त्व के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। अग्नाशय से इन्सुलिन का स्राव होता है जो रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को कंट्रोल में रखता है। इस प्रक्रिया में अवरोध होने पर डायबिटीज नामक रोग हो जाता है। डायबिटीज और इंसुलिन के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। छोटी आंत में पहुँचने के साथ ही पोषक तत्वों के अवशोषण की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है , जो आगे तक चलती है।

पेट में कितना खाना आ सकता है

How much is stomach capacity

एक वयस्क इंसान का आमाशय जब खाली होता है तो सामान्य तौर पर इसमें लगभग 75 ml जगह होती है। आमाशय में लचीलापन होने के कारण यह फैल सकता है।

अलग-अलग व्यक्ति में इसके फैलने की क्षमता अलग हो सकती है। यह आमाशय के दीवार की क्षमता तथा आस पास के अंगों जैसे लीवर , डायाफ्राम , अग्नाशय , बड़ी आंत आदि के आकार और इनकी स्थिति पर निर्भर होती है।

इसके अलावा आमाशय को अत्यधिक फैलने से रोकने वाली मांसपेशियों की मजबूती भी इसे प्रभावित करती हैं। सामान्यतया एक लीटर जितनी क्षमता तक फैलने पर पेट भरा हुआ महसूस होने लगता है।

कुछ लोगों के आमाशय की क्षमता 3 -4 लीटर तक भी हो सकती है। कभी कभी आदत के अनुसार शरीर खुद को ढ़ाल कर अपनी क्षमता ज्यादा या कम कर लेता है।

क्षमता से अधिक खाना खाने से तकलीफ होने लगती है तथा पाचन क्रिया भी बाधित होती है। अतः क्षमता से थोड़ा कम खाना फायदेमंद होता है।  नवजात शिशु का पेट मात्र 30 ml तक समाहित कर पाता है।

पेट के अलावा पाचन अंग

Digestion parts other than stomach

पाचन की क्रिया मुंह में खाना चबाने के साथ ही शुरू हो जाती है। चबाने से भोजन में लार मिक्स होती है। लार क्षारीय alkaline होती है तथा इसमें टायलिन ptyalin तथा अन्य कई पाचक एंजाइम एवं एंटीबैक्टीरियल तत्व होते हैं। लार Saliva  भोजन को पतला भी करता है जिससे निगलने में आसानी हो जाती है अतः खाना अच्छी तरह चबाना चाहिए।

पाचन क्रिया में आमाशय के अलावा लिवर Liver  , पित्ताशय  Gall Bladder , अग्नाशय Pancreas , तथा आँतों का भी बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य होता है।

पाचन क्रिया उचित रूप से होने पर शरीर किसी भी प्रकार के भोजन को सूक्ष्म तत्वों में तोड़कर उसके पोषक तत्वों को अधिकतम सीमा तक अवशोषित कर लेता है।

ये पोषक तत्व रक्त व अन्य स्थान पर पहुँचते है जिनका उपयोग शारीरिक अंगों को ताकत देने , नए ऊतकों का निर्माण करने तथा शारीरिक टूट फूट को ठीक करने में तथा बीमारियों को दूर करने के लिए किया जाता है।

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