सत्य नारायण व्रत कथा पांचवां अध्याय Satya Narayan vrat katha – 5

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सत्य नारायण व्रत कथा में पांच अध्याय हैं। पांचवें और अंतिम अध्याय की कथा यहाँ बताई गई है। सत्य नारायण के व्रत की कथा के पांचवें अध्याय की कथा भक्तिभाव से यहाँ पढ़ें और आनन्द प्राप्त करें।

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सत्यनारायण कथा का पहला अध्याय 

सत्यनारायण कथा का दूसरा अध्याय

सत्य नारायण कथा का तीसरा अध्याय 

सत्यनारायण व्रत कथा का चौथा अध्याय

सत्य नारायण कथा का पाँचवाँ अध्याय

satya narayan katha adhyay 5

सूत जी बोले –

हे ऋषियों ! मैं और एक कथा सुनाता हूँ। सुनो –

तुंगध्वज नाम का एक प्रजापालक राजा था। वह भी भगवान का प्रसाद त्यागकर बहुत दुखी हुआ था। एक समय वन में शिकार करते हुए वह एक गाँव में पहुंचा। उस गाँव में ग्वाले भक्तिभाव से बांधवों सहित सत्यनारायण जी का पूजन कर रहे थे।

राजा ने देखकर भी अनदेखा कर दिया। अभिमान वश ना तो वहाँ गया और ना ही भगवान को प्रणाम आदि किया। ग्वालों ने पूजा के बाद जब भगवान का प्रसाद उसके सामने रखा तो उसने प्रसाद भी नहीं खाया और अपने नगर में लौट आया।  ( Satya narayan vrat katha fifth adhyay…. )

वहां उसने पाया कि नगर में उसका सब कुछ नष्ट हो गया था। वह दुखी होकर इधर उधर दौड़ता रहा। फिर उसे गाँव में सत्य नारायण के पूजन के अनादर का ख्याल आया। वह सोचने लगा जरुर यह उसी का दुष्परिणाम है।

तुरंत वह वापस उसी गाँव में ग्वालों के पास गया और विधि पूर्वक पूजन करके प्रसाद खाया। फिर जब वापस अपने नगर लौटा तो सत्य देव की कृपा से सब कुछ पहले जैसा ठीक पाया। वह हर महीने पूजन करने लगा फिर दीर्घ काल तक सुख भोगकर मरने पर स्वर्ग लोक को चला गया।

जो मनुष्य इस दुर्लभ व्रत को करता है , भगवान की कृपा से उसे धन धान्य की प्राप्ति होती है। निर्धन धनी हो जाता है और बंदी बंधन मुक्त हो जाता है। संतान हीन को सन्तान प्राप्त होती है। उसके सब मनोरथ पूरे होते है तथा अंत में वह बैकुंठ लोक प्राप्त करता है।  ( Satya narayan vrat katha fifth adhyay…. )

सूत जी ने कहा –

जिन्होंने पहले इस व्रत को किया अब उनके दुसरे जन्म की कथा बताता हूँ।

वृद्ध शतानंद ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष को पाया। उल्का मुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को प्राप्त हुआ। व्यापारी ने मोरध्वज बन कर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष को प्राप्त किया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयं–भू होकर भगवान के भक्तियुक्त कर्म कर मोक्ष को प्राप्त किया।

यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा का पांचवा और अंतिम अध्याय समाप्त होता है।

बोलो सत्यनारायण भगवान की …जय !!!

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