कब क्या कितना और कैसे खायें स्वस्थ रहने के लिए – when what and how to eat

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हमारे भोजन का हमारे स्वास्थ्य पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है । भोजन मे पोषक तत्वों के होने के साथ अन्य कई चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है । जैसे कब खाना चाहिए , कितना खाना चाहिए , क्या खाना चाहिए और कैसे खाना चाहिए इत्यादि । यदि इन बातों का ध्यान ना रखा जाए तो कितना भी पौष्टिक भोजन हो उसका फायदा नहीं मिल पाता है ।

अतः यह बहुत आवश्यक है कि हम भोजन की गुणवत्ता के साथ उसकी मात्रा , खाने के समय , खाने का तरीका तथा अन्य बातों का पूरा ध्यान रखें । इस लेख को पूरा पढ़ें , इससे आप अवश्य लाभान्वित होंगे ।

कब क्या और कैसे खाना चाहिए इसका ध्यान रखने से भोजन अच्छे से पचता है । भोजन का पाचन सही तरीके से होने पर ही उसमे मौजूद पोषक तत्व हमे मिलते हैं और हमारे अंग सुचारु रूप से कार्य करते हैं । भोजन से ही हमे बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक शक्ति मिलती है तथा हमारी चुस्ती फुर्ती बनी रहती है ।

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भोजन संबंधी कई नियम और बातें आयुर्वेद मे बताई गई हैं । विज्ञान भी भोजन संबंधी बहुत से नियम बताता है । इन्हे मानना या नहीं मानना हमारी मर्जी पर निर्भर करता है लेकिन ये नियम और बातें नहीं मानने से कई प्रकार की शारीरिक समस्या जरूर पैदा हो जाती है ।

आयुर्वेद के अनुसार पहले खाया हुआ भोजन पच जाने पर ही दुबारा भोजन करना चाहिए । यह भोजन ताजा होना चाहिए । खाना ना तो बहुत जल्दी जल्दी खाना चाहिए और ना ही बहुत धीरे धीरे ।

भोजन की समुचित मात्रा खानी चाहिए । समुचित मात्रा मे किया गया भोजन ही हमे बल , वर्ण , सुख तथा आयु प्रदान करता है ।

भोजन करने से पहले शरीर के समस्त आवेग शांत होने चाहिए । मन प्रसन्न और निर्मल होना चाहिए ।

भोजन देर रात को नहीं करना चाहिए । रात के समय पाचन बहुत धीमी गति से होता है जो कई प्रकार की समस्या पैदा कर सकता है । गर्मी के मौसम मे रात 8 बजे से पहले , सर्दी मे 7 बजे से पहले और वर्षा ऋतु मे सूर्योदय से पहले भोजन कर लेना ठीक होता है ।

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जमीन पर पालथी लगाकर , अपनों के साथ बैठकर , प्रसन्न मन से संतुलित , पोषक और स्वादिष्ट भोजन , अपनी पाचक क्षमता के अनुसार , उचित मात्रा मे करना स्वास्थ्यकर होता है ।

भोजन मे यथा संभव छह रस – मधुर , अमल , लवण , कटु , तिक्त व कसाय का होना ठीक रहता है ।

आयुर्वेद के अनुसार कुछ चीजें लघु यानि सुपाच्य होती है और कुछ गुरु यानि गरिष्ठ । गरिष्ठ भोजन कम मात्रा मे ही खाने चाहिए जैसे हलवा , पूड़ी , रबड़ी , उड़द , तिल आदि । सुपाच्य यानि लघु चीजें भी अत्यधिक मात्रा मे नहीं खानी चाहिए ।

सुपाच्य खाद्य पदार्थों मे वायु व अग्नि गुण प्रधान होता है । ये पाचक अग्नि को बढ़ाने वाले होते हैं । इन्हे तृप्ति पूर्वक खा लेने पर भी अधिक दोष उत्पन्न नहीं होते ।

लेकिन गुरु या गरिष्ठ पदार्थों मे पृथ्वी तथा सोम गुण की अधिकता होने के कारण ये अग्नि को उदीप्त नहीं कर पाते । भरपेट इन्हे खाने से पाचन मुश्किल होता है ।

गरिष्ठ भोजन तृप्ति पूर्वक तभी खाना चाहिए जब आप कठोर व्यायाम करते हैं । क्योंकि कठोर व्यायाम से अग्नि बल बढ़ता है । गरिष्ठ भोजन अपने अग्नि बल की हैसियत का ख्याल रख कर ही खाना चाहिए ।

सूखे मेवे , आलू , टमाटर , सेब , मटर , चना , आदि वात को कुपित करते हैं अतः वात प्रकृति के लोगों को इन पदार्थों को कभी कभार ही लेना चाहिए । जबकि मीठे फल , अंगूर , केला ,  संतरा , नारियल , लाल चावल आदि वात प्रकृति के लोगों के लिए लाभकारी होते हैं ।

इसी प्रकार अधिक मसालेदार भोजन , मूंगफली का तेल , खट्टे फल , केला , पपीता , टमाटर , लहसुन आदि पित दोष को कुपित करते हैं । जबकि आम , संतरा , नाशपाती , हरी सलाद आदि पित दोष को शांत करते हैं ।

केला , नारियल , खजूर , पपीता , अनानास व विभन्न दुग्ध उत्पाद कफ को कुपित करते हैं जबकि सूखे मेवे , अनार , सफेद चावल , अंकुरित अनाज आदि कफ प्रकृति के लोगों के लिए उपयोगी रहते हैं ।

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भोजन के अंत मे पानी पीना हानिकारक होता है । बहुत जरूरी हो तो कम मात्रा मे ले सकते हैं ।

कुछ खाद्य पदार्थ पकाने के बाद देर तक रख देने पर बासी हो जाने पर या स्वरूप बदल जाने के बाद नहीं खाए जाने चाहिए ।

ठंडा होने पर पुनः गर्म किया हुआ भोजन , सूख जाने पर पानी मिलाकर पुनः गीला किया हुआ भोजन ,  अधपका , दुर्गंध युक्त , जला हुआ , स्वाभाविक रंग से भिन्न , पानी छोड़ चुके , बहुत नमक युक्त , भोजन का उपयोग नहीं करना चाहिए ।

ये सभी बातें अनुभवी और विशेषज्ञ लोगों द्वारा बताई गई हैं । इनकी पालना करके जरूर देखना चाहिए । इससे जरूर मदद मिलती है । फिर भी अपनी पाचन शक्ति का खुद के अनुभव से पता चलता है । उसी के अनुसार खाने पीने मे बदलाव कर लेना ठीक रहता है ।

Disclaimer : इस पोस्ट का उद्देश्य जानकारी बढ़ाना मात्र है । किसी भी उपचार के लिए विशेषज्ञ से संपर्क अवश्य करना चाहिए ।

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