मंगला गौरी व्रत का उद्यापन सम्पूर्ण विधि – Mangla Gauri Vrat Udyapan

मंगला गौरी व्रत का उद्यापन Mangla Gauri Vrat ujman  सावन महीने के शुक्ल पक्ष में किया जाता है।

मंगला गौरी का व्रत महिलाएं अपने पति की लम्बी आयु के लिए करती है। इसमें 16 या 20 मंगलवार के व्रत सावन महीने में किये जाते है।

16 मंगलवार के बाद 17 वें  मंगलवार को या 20 मंगलवार के बाद 21 वें मंगलवार को उद्यापन किया जा सकता है।

 

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मंगला गौरी व्रत उद्यापन

 

मंगला गौरी व्रत का उद्यापन – Mangla Gauri vrat udhyapan

 

सोलह या बीस मंगलवार के व्रत करने के बाद मंगला गौरी व्रत का उद्यापन मंगलवार के दिन किया जाता है। उद्यापन के दिन उपवास रखा

जाता है। गठजोड़े से पूजा पर बैठना चाहिए।

 

पूजा चार ब्राह्मण करते हैं। एक चौकी के चारों पैरों में केले का खम्बा बांध दें। अब एक ओढ़ने से ढ़क कर  मंडप बना लें। इस मंडप में कलश

रखकर उसके ऊपर कटोरी रखकर उसमे सोने से बनी मंगला गौरी बिठायें। इस पूजा में चांदी की सिल्ला और सोने की लोढ़ी रखें।

 

पीतल के भगोने में चावल और दक्षिणा डालकर ब्राह्मण को दें। माँ को साड़ी , ब्लाउज , ओढ़नी , नथ और सुहाग के सामान चढ़ाकर हमेशा की

तरह पूजा करें। हवन करें ,कथा सुने और आरती करें।

 

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आरती के लिए चांदी के सोलह दीपक बनाकर उसमे नाल की सोलह तार की और एक एक तार सोने की बत्ती बनवाकर रखें।

सोलह लड़डू , ब्लाउज पीस और रूपये  का बायना सासु माँ को देकर पैर छुएँ , आशीर्वाद लें।

 

पंडितों को भोजन कराएं। उन्हें धोती , गमछा , माला और लोटा देकर विदा करें।

दूसरे दिन सभी देवी देवता की पूजा करें। मंगला गौरी की पूजा करें। बहन से आरती करवायें।

 

सोलह पिटारी बनायें जिसमे साड़ी , पेटीकोट , ब्लाउज , नथ , पायल , कांच , कंघा , हिंगलू , सिन्दूर , रोली , मेहंदी , काजल नाल बिछिया  ,

चूड़ी , और जिन दीयों से आरती कर थी वे सोने के तार वाली बत्ती सहित रखें। एक अन्य पिटारी बनायें इसमें दिया ना रखें। यह पिटारी पैर

छूकर सासु माँ को दें। सोलह जोड़ी जिमाएँ। इन्हे एक एक सुहाग पिटारी देकर विदा करें।

 

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